भले ही मसीह हमारे जीवन में है तभी भी यह बात हमें मानना होगा कि हम एक मनुष्य है।

इसका अर्थ यह है की कभी कबार हम अपनी मर्ज़ी में काम करेंगे ना की परमेश्वर की इच्छा अनुसार। और यह बात मेरे बारे में और बाकी जीवित विश्वासियों के बारे में सही ही है।

भले ही हम परमेश्वर को खुश करना चाहते है, उस पर भरोसा करना चाहते है, मसीही जीवन को अच्छे से जीना चाहते है; तौभी सम्भावनाएं है की हम पाप करे।

यह लेख हमें स्पष्ट करेगा की पाप क्या है? और हम यह देख्नेगे की पाप परमेश्वर के साथ के हमारा रिश्ते में कैसे प्रभाव डालता है और कैसे नहीं।

और इससे भी बढ़कर यह कि हम कैसे परमेश्वर से माफ़ी मिल सकती है।

http://eknayajeevan.com/a/fall.html

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