हमारे प्रतिदिन के बल के लिये जो वचन परमेश्वर देता है उसका यह वचन ही हमारा आत्मिक भोजन है। परमेश्वर अपना जीवित वचन रोज व रोज देता है। संगति द्वारा भोजन और भी स्वादिष्ट बन जाता है। साथ मिलकर भोजन लेने से हमारी संगति भी आनन्ददायक बन जाती है। जब हम अकेले भोजन करते हैं तब इतना आनन्द प्राप्त नहीं होता। सर्वप्रथम प्रभु यीशु के साथ और उसके बाद एक दूसरे साथ संगति के लिये इकठ्ठा होना चाहिये।  हमें भी प्रभु यीशु के लिये ऐसा ही प्रेम होना चाहिये और जैसे मित्र मित्र के साथ वैसे ही उसके साथ भी बात करने की इच्छा होनी चाहिये। यह सच्ची संगति है।
 हमें, हमारे हृदयों को प्रभु के सामने खोलना चाहिये और हमारी निर्बलताओं, मुश्किलों और जरूरतों को उसे बताना चाहिये, और साथ ही साथ प्रभु को अवसर देना चाहिये कि वह हमारे साथ बात करें और किस कारणवश हम निर्बल है वह हमें बताये। प्रभु हमको बतायेगा कि किस रीति से सब कुछ ठीकठाक करना, किस रीति से बल प्राप्त करना और किस रीति हमारी आवश्यकतायें पूरी हों। उसके शब्द हमारे लिये बहुत ही बहुमूल्य और सच्चे बन जाते हैं।  जो प्रभु यीशु के साथ संगति द्वारा हम अनुभव करते हैं। उसके बाद व्यक्तिगत रीति से और पारिवारिक रीति से सच्ची वृद्धि आती है।
आमीन
प्रभु आपको आशीष दे
रैव्ह राजेश गिरधर
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