आपने ध्यान दिया होगा, हम सब के साथ एक जैसे बातचीत नहीं करते। आप जिस प्रकार से अपने बॉस से व्यवहार करते है शायद अपने स्टोर क्लर्क से वैसे नहीं। जो ख़ास बाते आप अपने मित्र से करते है शायद अपनी माँ से नहीं। 

हो सकता है आपको शाबाशी मिले।

अब जब आप परमेश्वर के साथ एक रिश्ते में है, आपको क्या लगता है की वह हमसे क्या चाहता होगा?

इस प्रश्न का उत्तर आपको चौंका सकता है। ऐसा नहीं है की — अच्छा बनना है, गलत काम नहीं करना है या फिर परमेश्वर की बहुत ज़्यादा कठिन सेवा करनी है या फिर पाप नहीं करना है।

पूरे बाइबिल में परमेश्वर ने इस बात को स्पष्ट किया है की वह हम से क्या चाहता है: उस पर बस भरोसा करे।

बहुत ही अदभुद बात है ना? परन्तु यही सत्य है।

परमेश्वर चाहता है की हम संपूर्ण मन से उस पर आश्रित हो, अपने आप को उसके हाथों में सौंप दे।

नीतिवचन 3:5 में लिखा है, “तू अपनी समझ का सहारा न लेना, वरन सम्पूर्ण मन से यहोवा पर भरोसा रखना”।

अगर हम परमेश्वर पर भरोसा करते है तो सही मायने में इसका क्या अर्थ है?

यह लेख हमें विस्तार से बताता है की विश्वास क्या है और क्या नहीं है। :  http://eknayajeevan.com/a/naturefaith.html

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