हम वर्षों से, महीनों से प्रभु से प्रार्थना कर रहे हैं,गीत गा रहे हैं,स्तूती कर रहे हैं,अराधना रहे हैं यह सोच कर कि प्रभु हमसे बात करेगा, हम उसका दर्शन करेंगे,हम उसकी आवाज को सुनेंगे, क्या सच में हम,ख़ुदा की आवाज़ सुनने की आरज़ू रखते हैं| ख़ुदा की आवाज़ और वो ख़ामोशी जो हमसे कुछ कहना चाहती है  प्रकाशितवाक्य में येशू ने बार बार कहा , जिसके कान हों , वो सुन ले| ख़ुदा की वो धीमी आवाज़ सुनने के लिए , ख़ामोशी निहायत ज़रूरी है| आम ज़िन्दगी में शोर शराबा बहुत होता है| एक शोर , हमारे बाहर का होता है ; और दूसरा शोर,हमारे अंतर्मन में| सुखों में इतना शोर होता है , की लोग ख़ुदा की आवाज़ सुनना नहीं चाहते , या सुन नहीं पाते हैं| हमारे अंतर मन में भी, बहुत शोर  मचा रहता है| शायद हमारे कुड़कुड़ाने और बड़बड़ाने का| जब अपनों से दुख मिलता है,या जब कोई (खास अपना)दिल तोड़ता है| हमारे दिल के टूटने का जो शोर पैदा होता है , वो शोर बहुत दिनों तक हमारे अन्दर गूंजता रहता है| जंगल में आवाज़ दूर तक सुनाई देती है , क्योंकी वहां ख़ामोशी और सन्नाटा होता है| अपने अन्दर से उस तमाम शोर को हटा कर उस आत्मिक खामोशी में आकर उस धीमी आवाज़ सुनने की कोशिश करें जो शोर , शाराबे में सुनाई नहीं देती| प्रभु की आवाज को सुनने के लिए उस खामोशी का होना बहुत जरूरी है। 
 आमीन
प्रभु आपको आशीष दे
रैव्ह राजेश गिरधर
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