ख़ुदा हमारी मदद इसलिए करता है, कि हम कोशिश करें और कामयाबी हासिल करें| ख़्याल कभी-कभी, दिमाग़ की दहलीज़ से बाहर नहीं आ पाते| कई बार संकल्प लिए जाते हैं, मगर वो कभी पूरे नहीं होते| हम सोचते हैं, और बस सोचते ही रह जाते हैं| मंज़िल सोचने से नहीं, चलने से मिलती है| रोमियों 12:11 में लिखा है — कोशिश करने में सुस्ती न करो, आत्मिक जोश में भरे रहे।  आशीषें अच्छी हैं, मगर सुविधाएं और बहुतायत हमें आलसी ना बना दें| कहते हैं सुख और दुख जीवन के दो पहलू हैं ,सुख आपको कमज़ोर बना सकता है, और दुख कोई पसंद नहीं करता| मगर दुख में ही आपकी परख होती है, आग से गुज़रने के बाद ही सोने में चमक पैदा होती है| परेशानियां, बीमारियां, दुख तकलीफ आपकी इच्छा शक्ति को परखने के लिए हैं| *रुकना या न रुकना, ये रोकने वाले पर नहीं, आप पर निर्भर है| पौलूस ने फ़ैसला कर लिया था, निशाने को पाने का है, उसका ध्यान राह की रुकावटों पर नहीं, अपनी मंज़िल पर था| आपको तब तक नहीं रुकना है, जब तक मंज़िल न मिल जाए| 
आमीन
प्रभु आपको बहतायत की आशीष दे। 
रैव्ह राजेश गिरधर
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