बहुत बार हम कुछ ऐसे कामों को करते हैं जिन्हे करने को हमारी आत्मा गवाही नहीं देती पर हमारा दिमाग उस काम को करने में आगे भागता है और जब उस काम को हम कर लेते हैं तब हमें उस किये हुए काम का पछतावा होता है हमने यह क्यों किया ?
अगर इस काम को न करते तो अच्छा ही होता ऐसी सोच हमारे मन में आने लगती है मन गलानि से भर जाता है पछतावा होता है पर काम तो कर चुके और उसका भुगतान भी करना पडेगा वो एक गलत काम हमारी बहुत सी खूबियों को खत्म कर देता है उसी पर परमेश्वर की नजर रहती है क्योंकि वो हमारे अन्दर क्या चल रहा है और हम बाहर क्या दिखा रहे हैं यह सब वो जानता है उसी के हिसाब से फिर हमारे साथ होता भी है ।
मन तो चंचल है सबसे अधिक वही मनुष्य को धोखा देनेवाला है उसी एक काम को करके मनुष्य दोषी ठहरता है, परमेश्वर न्याय करता है वो किसी का पक्षपात नहीं करता वो हमारे हर उस काम का दण्ड देता है जो हम मन की अभिलाषाओं में फसकर करते हैं वो राजाओं को भी दण्डित करता है तो आम आदमी का भी न्याय अटल है उसके न्याय आसन के सामने सब बराबर है कोई भेदभाव नहीं क्योकि उसने तो मनुष्य को बनाया व स्वतंत्र किया पर मनुष्य अपनी ही अभिलाषाओं में पडकर पाप कर बैठा है, जिसका भुगतान करना पडता है क्योंकि वो हमारी चाल चलन के अनुसार ही हमारे कामों का फल देता है जिससे कोई भी बच नहीं सकता ।
आमीन
प्रभु आपको आशीष दे
रैव्ह राजेश गिरधर


