आज के समय में बहुत सारे लोगो की सोच बन गयी हैं कि हम दीन क्यो बने। इस कारण से आज संसार दीनता को महत्व नही देता हैं। लेकिन परमेश्वर ने अपने वचनों में हमेशा दीनता को ही प्राथमिकता दी हैं।
दीन होने का मतलब है कि हम अपने दुर्बलताओं के बारे में जाने और परमेश्वर से हमे जो आशीषें मिली हैं उसके लिए हम परमेश्वर को धन्यवाद दे।
हमें दीन इसलिए बनना है क्योंकि हम प्रभु के सिवाय और किसी पर घमण्ड नही कर सकते।
हमारा मूल्य और फलवन्त होना प्रभु पर निर्भर हैं और परमेश्वर की सहायता के बिना हम कुछ भी नही कर सकते हैं।
परमेश्वर दीनता से चलने वालों के साथ रहता हैं परमेश्वर दीनो को अनुग्रह देता हैं पर अभिमानियों से विरोध करता हैं।
उसकी सन्तान प्रभु की सेवकाई दीनता से करते हैं।
क्योकि हम विश्वासी हैं इसलिए हमें दूसरों के प्रति दीन होना चाहिए।
दीनता का विपरीत हैं घमण्ड, जो उस व्यक्ति में पाया जाता हैं जो अपनी खूबी, श्रेष्ठता और उपलब्धियों के कारण अपने आप में अहंकार और स्वाभिमान की भावना रखता हैं।
कहते हैं हमेशा झुका हुआ पेड ही फल पाता है ,अगर हमने भी प्रभु की राह पर चलते हुए फल पाने है तो हमें दीनता और नम्रता में आना पड़ेगा। तभी हम अपने प्रभु के कार्य को कर पाएंगे,और उसके मन भावने पात्र बन पाएंगे
आमीन
परमेश्वर आप सभी को आशीष करें।
रैव्ह राजेश गिरधर

