इंसान की ज़िंदगी में परमेश्वर को वो एहमियत नहीं मिलती है, जिसका की परमेश्वर हक़दार है, जबकि ज़िन्दगी उसी की देन हैं,
दुआओं के ना सुने जाने की, यह भी एक बड़ी वज़ह हो सकती है। क्या हम पूर्ण रूप से परमेश्वर के वचन को मान्यता देते हैं, क्या वो हमारे लिए सबसे पहला स्थान है।
वो अल्फ़ा और ओमेगा है, वो ही आदि और अन्त है,
प्रकाशितवाक्य 21:6, में लिखा हैं :- मैं अलफा और ओमेगा, आदि और अन्त हूं: मैं प्यासे को जीवन के जल के सोते में से सेंतमेंत पिलाऊंगा। इसका मतलब यह ही नहीं है कि वो पहला और आखरी है ; इसका मतलब है, वो ही सबसे पहले था और तब से लेकर आख़िर तक वही सब कुछ है।
बत्ती के चले जाने के बाद ही, मोमबत्ती की याद आती है; मगर हम परमेश्वर के वचन के साथ ऐसा नहीं कर सकते ज़रा सोचिए अगर दुनियां में परेशानियां, बीमारियां, नाकामयाबियां, और मृत्यु नहीं होती, तो क्या इंसान को परमेश्वर की या उसके वचन की ज़रूरत होती? शायद नही? जिस जीवित वचन से हमें सहारा मिलता हैं। उसी वचन की हमारे जीवन में कोई प्राथमिकता नही हैं। आज इंसान इतना व्यस्त यानी बिजी है, कि परमेश्वर के वचन को पढ़ने का भी उसके पास वक़्त नहीं है? मति 4-4 के अनुसार:- इन्सान केवल रोटी से नही परमेश्वर के हर एक वचन से जीवित रहेगा। जो आत्मा की रोटी हैं, उसे अपने जीवन से दूर कर देते हैं। यीशु ने कहा तुम जीवन पाने के लिए मेरे पास आना नही चाहते।
भजन संहिता 119:105, में लिखा हैं:- तेरा वचन मेरे पांव के लिये दीपक, और मेरे मार्ग के लिये उजियाला है।
इसी वचन से हम दूर भागते हैं। इसे पढ़ना नही चाहते इसे सुनना नही चाहते हमेशा की ज़िंदगी तो तब हमें मिलेगी जब परमेश्वर का वचन हमारी ज़िन्दगी में सबसे पहले स्थान पर होगा।
आजकल लोगों के लिए, अपना घर पहले है, और परमेश्वर का घर बाद में हैं, जोकि हम खुद हैं। ख़ुदा के वचनों को अपनी ज़िन्दगी का अल्फ़ा बना लीजिये, वो आपको ओमेगा तक अपने साथ बनाये रखेगा।
आमीन
प्रभु आपको आशीष दे
रैव्ह राजेश गिरधर

