पानी में होती है जादुई शक्ति (पानी की भी यादाश्त होती है)

Water has Memory (Miracle of Water)

 

हमारी संस्कृति में पानी को रखने से लेकर पीने तक के लिए कुछ तौर-तरीके निश्चित किए गए थे, जिन्हें अंधविश्वास कह कर हम नकारते चले गए। आज उन्हीं बातों की पुष्टि विज्ञान भी कर रहा है। तो आइए जानते हैं उन तौर-तरीकों को –

पंचतत्वों के गुणों को बदलना या यह तय करना कि ये तत्व हमारे भीतर कैसे काम करेंगे, काफी हद तक मानव-मन और चेतना के अधीन है। इसके विज्ञान और तकनीक को इस संस्कृति में पूरी गहराई से परखा गया था और उसे एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी को सौंपा जाता रहा।

सही तरह के नजरिए, एकाग्रता और ध्यान देने से क्या आप शरीर रूपी इस बरतन के जल को मिठास से नहीं भर सकते? अगर आप ऐसा कर पाएं, तो आप बहत्तर फीसदी मीठे हैं, क्योंकि आपके शरीर में लगभग इतनी ही पानी की मात्रा है। लेकिन पिछले सौ सालों में, जीवन के प्रति अपने बहुत अहंकारी रवैये के कारण हमने बहुत सी चीजें छोड़ दीं। इस देश में हमारे पास ज्ञान का जो भंडार है, अगर हम उसे फिर से अपना लें, तो वह न सिर्फ इस देश के कल्याण के लिए बल्कि पूरी दुनिया के कल्याण के लिए एक महान साधन हो सकता है। पश्चिम से आने वाले सभी तरीके आम तौर पर बस थोड़े समय के लिए उपयोगी होते हैं। उनके यहां सब कुछ बस इस्तेमाल करके फेंक देने के लिए होता है। यहां तक कि इंसान भी। दिक्कत यह है कि राजनैतिक तथा कुछ दूसरी किस्म के प्रभाव के कारण कोई चीज अगर पश्चिम से आए तो विज्ञान बन जाती है, और अगर पूर्व से आए तो अंधविश्वास।

बहुत सी बातें जो आपको कभी आपकी दादी-नानी ने बताई होंगी, आज बड़े-बड़े वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं में ‘महान-आविष्कारों के रूप में खोजी जा रही हैं। जो बातें वे अरबों डॉलर के रिसर्च और अध्ययनों के बाद बता रहे हैं, हम अपनी संस्कृति में पहले से कहते आ रहे हैं। इसका कारण यह है कि हमारी संस्कृति जीवन की विवशताओं से विकसित नहीं हुई है। यह वह संस्कृति है, जिसे ऋषि-मुनियों ने विकसित किया है, इसका ध्यान रखते हुए कि आपको कैसे बैठना चाहिए, कैसे खड़े होना चाहिए और कैसे खाना चाहिए। मानव कल्याण के लिए जो सबसे श्रेष्ठ है, उसे ध्यान में रखते हुए इसे तैयार किया गया था और इसका बहुत वैज्ञानिक महत्व है।

खास तौर पर पिछले कुछ वर्षों में, पानी और पानी की क्षमता पर काफी शोध किया गया है। वैज्ञानिक एक बात कह रहे हैं कि पानी में याददाश्त होती है। पानी जिसके भी संपर्क में आता है उसे याद रखता है। आज-कल घरों में जो पानी पहुंचाने की व्यवस्था है उसमें, पानी को बलपूर्वक पंप किया जाता है और उसे आपके नल में आने से पहले पचास घुमावों से गुजरना पड़ता है। जब तक वह पानी आपके घर पहुंचता है, कहा जाता है कि वह साठ फीसदी जहरीला हो चुका होता है, रासायनिक रूप से नहीं, बल्कि इसलिए क्योंकि उसका आणविक-ढांचा यानी ‘मॉलिक्यूलर स्ट्रक्चर बदल जाता है।

जब आपकी दादी-नानी ऐसा कहती थीं, तो वह अंधविश्वास था। जब आप यह चीज अमेरिका में वैज्ञानिकों से सुनते हैं, तो आप इसे गंभीरता से लेंगे। यह एक तरह की दासता है। बैक्टीरिया की वजह से कोई चीज जिस तरह दूषित होती है, हो सकता है कि वह उस तरह दूषित न हो, लेकिन तेजी से गुजरने की वजह से पानी के आणविक ढांचे में इस तरह का बदलाव आ जाता है कि वह लाभदायक नहीं रह जाता, बल्कि विषैला भी हो सकता है। अगर आप इस जल को तांबे के एक बरतन में दस से बारह घंटे तक रखें, तो उस नुकसान की भरपाई हो सकती है। लेकिन अगर आप उसे सीधे नल से पीएं, तो आप एक खास मात्रा में जहर पी रहे हैं। लोग इस तरह से जिंदगी जीते हैं और कहते हैं, ‘मुझे कैंसर कैसे हो गया? मुझे यह बीमारी क्यों हो गई?Ó अगर आप जीवन के प्रति बिना किसी संवेदना के जीते हैं, जो तत्व आपको बनाते हैं, उनका ख्याल नहीं रखते तो सब कुछ ठीक होने की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?

पाया गया है कि पानी की रासायनिक संरचना को बदले बिना, आप आणविक व्यवस्था को इस तरह व्यवस्थित कर सकते हैं कि पानी आपके शरीर में बिल्कुल अलग तरीके से काम करे। उदाहरण के लिए, अगर मैं अपने हाथ में एक गिलास पानी लूं, उसे एक खास तरीके से देखूं और आपको दूं, तो उसको पीने से आपका भला हो सकता है। वहीं अगर मैं उसे दूसरे तरीके से देखूं और आपको दूं, तो उसे पीकर आप आज रात को ही बीमार पड़ जाएंगे।

आपकी दादी-नानी आपसे कहा करती थीं, ‘तुम्हें हर किसी के हाथ से न तो पानी पीना चाहिए और न ही खाना खाना चाहिए। तुम्हें ये चीजें हमेशा उन्हीं लोगों के हाथ से लेनी चाहिएं जो तुमसे प्रेम करते हैं और तुम्हारी परवाह करते हैं। किसी से भी ले कर और कहीं भी बैठ कर कोई चीज नहीं खानी चाहिए। जब आपकी दादी-नानी ऐसा कहती थीं, तो वह अंधविश्वास था। जब आप यह चीज अमेरिका में वैज्ञानिकों से सुनते हैं, तो आप इसे गंभीरता से लेंगे। यह एक तरह की दासता है।

इस संस्कृति में, हमें हमेशा से मालूम था कि जल की अपनी याददाश्त होती है। आप जिसे तीर्थ कहते हैं, वह बस यही है। आपने देखा होगा कि लोग मंदिर से तीर्थ की एक बूंद पाने के लिए कैसे बेचैन रहते हैं। अगर आप अरबपति भी हैं, तो भी आपमें उस एक बूँद के लिए लालसा होती है, क्योंकि आप उस जल को ग्रहण करना चाहते हैं जिसमें ईश्वर की स्मृति हो।

अगर आप तमिलनाडु के किसी पारंपरिक घर में जाएं, तो आप देखेंगे कि जल एक खास तरीके से पीतल या तांबे के बरतनों में रखा गया है। यह रिवाज पहले देश में हर जगह था, लेकिन दूसरे स्थानों में यह काफी हद तक खत्म सा हो गया है। वे हर सुबह पानी वाले बरतन को इमली से मांजते हैं, थोड़ी विभूति और थोड़ा कुमकुम लगाते हैं और उसकी पूजा करते हैं। उसके बाद ही वे उसमें पानी रखते हैं और उसी से पानी पीते हैं क्योंकि उन्हें हमेशा से पता है कि जल की याददाश्त होती है। वे जानते हैं कि आप जल को जिस तरह के बरतन में रखते हैं और उसके साथ जैसा बरताव करते हैं, उससे यह तय होता है कि वह आपके भीतर कैसा व्यवहार करेगा।

मैं आपको एक घटना के बारे में बताता हूं। कुछ साल पहले, मैं एक दक्षिण भारतीय घर में गया। यहां अतिथि सत्कार में सबसे पहले आपके लिए पीने का पानी लाते हैं। तो घर की गृहिणी मेरे लिए पीने का पानी लाईं। मैंने उनके चेहरे की ओर देखा, वो काली की तरह रौद्र दिख रहीं थीं। दरअसल उनके पति नब्बे दिन के एक कार्यक्रम के लिए मेरे साथ आना चाहते थे। वह एक अच्छी महिला हैं, लेकिन उस दिन वह काली की तरह थीं। इसलिए जब वह पानी लाईं, तो मैंने कहा, ‘अम्मा, आज आप काली की तरह दिख रही हैं। मुझे इस जल की कोई जरूरत नहीं है।
मैं ऐसी बुरी हालत में नहीं हूं कि पानी के बिना काम न चले। वो बोलीं- ‘यह अच्छा पानी ही है। मैंने कहा ‘यह पानी अच्छा है, लेकिन आप जिस रूप में हैं, मुझे यह पानी पीने की जरूरत नहीं है।

अगर सद्गुरु आपके घर आएं और पानी पीने से इनकार कर दें, तो एक दक्षिण भारतीय परिवार में यह कोई छोटी बात नहीं है। नाटक शुरू होने लगा।

इसलिए मैंने उससे कहा इस पानी की एक घूंट आप पीजिए। उनको लगा कि मैं पानी की जांच के लिए उनको चखने को कह रहा हूं, उसने पी लिया और बोली यह अच्छा है।

मैंने उनसे वह पानी लेकर बस एक मिनट तक उसे अपने हाथ में पकड़े रखा। फिर उनको दिया। ‘अब इसे पीजिए। उन्होंने उसे पीया, उनके आंसू निकलने लगे और वह रोने लगीं ‘अरे यह कितना अच्छा है! यह मीठा है। मैंने कहा, ‘जीवन ऐसा ही है। अगर आप एक खास रूप में हैं, तो सब कुछ मीठा हो जाता है। अगर आप किसी दूसरे तरह से हैं, तो आपके जीवन में सब कुछ कटु हो जाएगा।

अगर सिर्फ एक विचार या निगाह से, आप किसी बरतन के पानी को मीठा कर सकते हैं, तो सही तरह के नजरिए, एकाग्रता और ध्यान देने से क्या आप शरीर रूपी इस बरतन के जल को मिठास से नहीं भर सकते? अगर आप ऐसा कर पाएं, तो आप बहत्तर फीसदी मीठे हैं, क्योंकि आपके शरीर में लगभग इतनी ही पानी की मात्रा है।

साभार: सद्गुरु (ईशा हिंदी ब्लॉग)

Information from Other Sources

“जल या पानी” जो की सभी जीवों के जीवन की एक मूलभूत जरुरत है, और पृथ्वी की 76.5% भाग को ढके रहता है तथा मनुष्य के शरीर के 65% से ज्यादा का भार होता है, उस पानी की अपनी यादाश्त भी होती है। जी हाँ आप ने सही जाना। पानी की यादाश्त होती है तथा यह अपने साथ इसे समेटे रहता है।

इस तथ्य को पहली बार एक फ्रेंच immunologist डा. जेकेस बेन्विस्ते ने 1988 में दुनिया के सामने रखा था। बाद में जापान के डॉ. इमोतो और अन्य बहुत से वैज्ञानिकों ने इस खोज को अत्यंत गुणवता से आगे बढ़ाया और कुछ ज्यादा रोचक और अहम् जानकारी को सामने लाया।

ऐसे बहुत से प्रयोग किये गए जो डॉ बेन्विस्ते की hypothesis “पानी की यादाश्त” को प्रमाणित करते हैं। इसमें कहा गया कि जब भी पानी किसी भी वास्तु के स्पर्श में आता है तो पानी उस वस्तु से सम्बंधित जानकारी अपने में समेट लेता है और उसे store भी कर लेता है। पानी की ये यादाश्त वैज्ञानिकों को हैरान करती थी। अन्य सभी प्रयोग इसी बात से शुरु हुए और कुछ ज्यादा लाभदायक और रोचक तथ्यों तक पहुच गए। ये भी पता लगाया गया कि पानी न सिर्फ आस पास की चीजों को याद रखता है बल्कि ये तो “intention” या फिर “इरादों” या यूँ कहिये कि विचारों को भी समझता है और फिर अपने आप में “intention” के हिसाब से बदलाव भी लाता है। ये पाया गया कि अगर पानी को किसी भी तरह के “intention” दिए जाएँ तो इसके crystals की भौतिक सरंचना में बदलाव आते हैं जी हाँ आप ने सही पढ़ा। सिर्फ सोचने भर से. और ये बदलाव अलग अलग प्रकार के “intention” के लिए बिलकुल अलग अलग होते हैं।

है न ये मजेदार और रोचक बात?

इस research को आगे बढ़ाने और सबसे गहन अध्ययन का श्रेय जापान के स्कॉलर Dr Emoto को जाता है। उन्होंने अपने जीवन के अधिकांश वर्ष पानी और उस पर पड़ने वाले intention के प्रभावों में व्यतीत किए। Dr Emoto का काम बेहद महत्वपूरण और interesting है। Dr Emoto ने अपने शोध में बहुत से experiment किये जिस में उन्होंने एक ही स्त्रोत से लिए पानी के samples को ऊपर विभिन्न प्रकार के “intention” या विचरों का डाला। ये विचार या तो कोई नकारात्मक विचार थे, या सकारात्मक विचार, या विभिन्न प्रकार की प्रार्थनाएं, या तरह तरह के world leaders की pictures तथा अलग अलग धर्मों से जुड़े विशेष विचार। अपनी research के result उन्होंने दुनिया के सामने पेश किये।

इस research के परिणाम सही में अचम्भित कर देने वाले थे। उन्होंने पाया की वो विचार/thoughts या वो intentions जो सुदरता, शांति, प्यार या ख़ुशी इत्यादि देने वाली भावना से परिपूरण थे उन विचारों ने पानी के crystals की सरंचना को को बहुत ही खुबसूरत, आकर्षक और aesthetic सरंचना में बदल दिया था। मगर वो विचार/thoughts या intentions जो की नफरत, गुस्से, जलन इत्यादि वाली भावना से भरे थे, उन विचारों ने उसी पानी के crystals की सरंचना को बहुत ही भद्दा और filthy सरंचना में बदल दिया था।

Dr Emoto या इस से सम्बंधित ज्यादा जानकारी के लिए आप निचे दिए link को visit करें:

https://www.masaru-emoto.net/en/science-of-messages-from-water/
 

Aerospace Institute of University, Germany ने इस research में एक और interesting बात को साबित किया। ये बात है पानी की memory के बारे में। इस विश्वविद्यालय की एक खोज में साबित किया गया गया कि पानी न सिर्फ विचारों से प्रभावित होता है बल्कि ये आस पास की जानकारी नही एकत्रित करता है। इस बात को साबित करने के लिए वैज्ञानिकों ने एक ही तरह के पानी के अलग अलग samples में विभिन प्रकार के फूलों को डुबोया और फिर पानी के भौतिक सरंचना को जांचा। और पाया गया कि पानी की सरंचना बिलकुल फूलों की आकृति से मिलती जुलती हो जाती है। यहाँ तक कि इस नई सरंचना को देख कर ये साफ़ साफ़ बताया जा सकता है कि इस पानी में कौन सा फूल डुबोया गया था।

इस के बाद एक और experiment ने अपने दायरे के मामले में तो सारी हदों को ही पार कर दिया। और ये experiment “DOUBLE BLIND TEST” के नाम से विख्यात हुआ। Dr. Dean Radin, IONS के chief scientist और जापान के स्कॉलर Dr. Emoto ने Dr. Gail Hayssen तथा Dr. Takashige Kizu के साथ मिलकर इस experiment को अंजाम दिया। इस experiment के लिए Tokyo के 2000 लोगों को California में बने एक विशेष electromagnetically बंद किये कमरे में रखे हुए पानी के samples पर अपना ध्यान केन्द्रित करने को कहा गया। जिस में उन्हें तरह तरह की भावनाओं वाले विचरों को सोचने के लिए कहा गया। ये experiment लगातार तीन दिन तक चला।

बाद में बंद कमरे में रखे गए पानी की बूंदों के एक बहुत ही expert technicians की टीम ने तस्वीरें खींचीं। इस सारी तस्वीरों को 2500 विभिन्न Judges को उनकी independent assessments के लिए भेजा गया। फिर सारे Judges के निर्णयों का विश्लेषण किया गया। और जो तथ्य निकलकर आये वो Dr Emoto के किये कार्य को सत्यापित करते थे। जिसमे कहा गया कि पानी सोच को समझता है और सोच के हिसाब से अपनी सरंचना बदलता है। ये भी पाया गया की अच्छे और सकारात्मक विचार पानी की सरंचना को सुन्दर और आकर्षक बनती है। जबकि नकारात्मक विचार पानी में गंदे और बेरुखे सरंचना को बनाती है। इस से भी हैरान करने वाली बात है कि विचारों ने किसी तरह की दुरी या समय के बंधन से परे अपना असर दिखाया है। ऐसी बातें तो सिर्फ हम कहानियों में ही सुना करते थे।
Experiment के details जानने के लिए निचे link को click करें:

https://library.noetic.org/library/publication-scholarly-papers/double-blind-test-effects-distant-intention-water-crystal

इन सभी experiments से एक बात तो साफ़ है पानी की बुँदे इरादों/intentions या विचारों के हिसाब से अपने में परिवर्तन लाती है। इस से ये भी साबित हो जाता है कि पानी चेतना को समझता है और उसके प्रति सवेंदनशील भी है। अगर ये बात सही तो फिर इस धरती का क्या जो कि ज्यादातर पानी से घिरी है। और तो और आप के उस शरीरअ जो 65% पानी से बना है। इस से ये तो जाहिर है कि आपके मन में पनपने वाले दिन भर के विचार आप के अन्दर हर उस हिस्से पर असर डालता है जहाँ पानी मौजूद है। साफ़ है कि आप के विचार आप के जीवन का निर्माण करते हैं। इस का मतलब तो ये हुआ कि आपका जीवन आप के हाथ में ही है। और इस जीवन में आप अपनी इच्छा अनुसार बदलाव ला सकते हैं।

आप को ये जान कर हैरानी होगी कि ये बात कुछ लोगों के लिए नई हो सकती है मगर public domain इस तरह की जानकारी से लबालब भरा पड़ा है। लोग अपने आप ही इस तरह के विचारों की ताकत को सत्यापित करने वाले experiments कर रहें हैं। लोग जान रहें है कि कोई तो ऐसी विशेष बात है विचारों कि ब्रहमांड का कोई भी कोना ताकतवर विचारों के लिए अभेद नही है। विचार समय और दुरी के बंधन से भी परे है। Quantum Science ने पहले ही इस और इशारा कर दिया है। बल्कि दुनिया में मौजूद हर ग्रन्थ ने भी इसे पहले ही validate कर दिया है। विचार ही एकमात्र ऐसा बिंदु नजर आता है जहाँ विज्ञानं और धर्म एक दुसरे से पूरी तरह सहमत नजर आते हैं। दुनिया के महानतम लोगों के जीवन को देखें तो लगता है कि वो पहले ही इस रहस्य को जानते थे और अपनाते थे। और इसी को बदोलत दुनिया का दिल जीत पाए और सफल भी हुए।

मेरा मानना है कि धरती उत्पति से लेकर अभी तक के सफ़र का ये सबसे स्वर्णिम समय है। आज की उन्नत तकनीकों की बदोलत पूरा विश्व अपने आप में एक single community बन गया है। Information पालक झपकते ही अपने गंतव्य तक पहुच जाती है। एक ही विचारधारा वाले लोग एक दूसरे से मिले बिना ही एक दूसरे से जानकारी सांझा कर सकते हैं। इस स्वर्णिम समय मे जरूरत है तो बस एक ताकतवर इरादे और अच्छे विचार की। उस विचार को फलीभूत होने के लिए सारे संसाधन पहले से ही मौजूद है।
उम्मीद है ऐसा कोई न कोई विचार आपके पास जरूर होगा। इस विचार को एक अटूट इरादे की मजबूती दें और छोटे से छोटे कदम उठा कर शुरुआत करें। और फिर इस विश्व में आप भी अपनी एक छाप छोड़ कर जाएं।

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