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🌸 *”अपना जीवन कमल पुष्प समान कैसे बनायें”*❓
◼️ स्नेह और सौहार्द्र के प्रभाव के कारण आज मनुष्य को घर में घर-जैसा अनुभव नहीं होता एक मामूली कारण से घर का पूरा वातावरण बिगड़ जाता है अब मनुष्य की वफ़ादारी और विश्वास पात्रता भी टिकाऊ और दृढ़ नहीं रहे नैतिक मूल्य अपने स्तर से काफी गिर गए हैं कार्यालय हो या व्यवसाय, घर हो या रसोई, अब हर जगह परस्पर संबंधो को सुधारने, स्वयं को उस अनुरूप ढालने और मिलजुल कर चलने की जरुरत है ।
◼️ अपनी स्थिति को निर्दोष एवं संतुलित बनाये रखने के लिए हर मानव को आज बहुत मनोबल इकट्ठा करने की आवश्यकता है इसके लिए योग बहुत ही सहायक हो सकता है ।
◼️जो ब्रह्माकुमार कुमारी हैं, वे दूसरों को भी शांति का मार्ग दर्शाना एक सेवा अथवा अपना कर्तव्य समझते हैं। ब्रह्माकुमार कुमारी जन-जन को यह ज्ञान दे रहे हैं की  *”सुख और “शांति पवित्र जीवन का एक फल है”* और पवित्रता एवं शांति के लिए परमपिता परमात्मा का परिचय तथा उनके साथ मान का नाता जोड़ना जरुरी है। अत: वह उन्हें राजयोग-केंद्र अथवा ईश्वरीय मनन चिंतन केंद्र पर पधारने के लिए आमंत्रित करते हैं, जहाँ उन्हें यह आवश्यक ज्ञान दिया जाता है की राजयोग का अभ्यास कैसे करें और जीवन को कमल पुष्प के समान कैसे बनाये।
◼️ इस ज्ञान और योग को समझने का फल यह होता है की कोई कार्यालय में काम कर रहा हो या रसोई में कार्यरत हो तो भी मनुष्य शांति के सागर परमात्मा के साथ स्वयं का सम्बन्ध स्थापित कर सकता है। 
◼️इस सब का श्रेष्ठ परिणाम यह होता है कि सारा परिवार प्यार और शांति के सूत्र में पिरो जाता है,और वे सभी वातावरण में आनन्द में एवं शांति का अनुभव करते हैं और अब वह परिवार एक सुव्यवस्थित एवं संगठित परिवार बन जाता है। 
◼️ दिव्य ज्ञान के द्वारा मनुष्य विकार तो छोड़ देता है और गुण धारण कर लेता है। इसके लिए, जिस मनोबल की जरुरत होती है, वह मनुष्य को राजयोग से मिलता है। इस प्रकार मनुष्य अपने जीवन को कमल पुष्प के समान बनाने के योग्य हो जाता है।  
                                    
◼️ *कमल की यह विशेषता है* की वह जल में रहते हुए जल से न्यारा होकर रहता है हालाँकि कमल के अन्य सम्बन्धी, जैसे कि कमल ककड़ी, कमल डोडा इत्यादि है, परन्तु फिर भी कमल उन सभी से ऊपर उठकर रहता है। 
◼️ इसी प्रकार हमें भी अपने परिवार, सम्बंधियों एवं मित्रजनों के बीच रहते हुए उनसे भी न्यारा, अर्थात मोहजीत होकर रहना चाहिए कुछ लोग कहते हैं कि गृहस्थ में ऐसा होना असम्भव है परन्तु हमने स्वयं को कभी मोह से रहित होकर रहने का कभी ख्याल ही नहीं किया इसलिए असंभव प्रतीक होता है। 
◼️ हम ऐसा मानते हैं कि अगर मोह नहीं तो प्यार नहीं। परन्तु ऐसा नहीं है। मोह हमें दुःख भी देता है और मोह होने से प्यार भी स्वार्थ वाला प्यार हो जाता है और वहीं मोहरहित प्यार में निस्वार्थ प्रेम और सेवा समाई होती है। मोह वश प्यार में स्वयं और अपनों को दुःख पहुँचता है और वहीं मोहरहित प्यार में स्वयं और अपनों को सुख पहुँचता है। 
◼️ *हमें चाहिए कि हम सभी को परमपिता परमात्मा के बच्चे मानकर न्यासी ( ट्रस्टी ) होकर उनसे व्यवहार करें। एक न्यायाधीश भी ख़ुशी या गमी के निर्णय सुनाता है, परन्तु वह स्वयं उनके प्रभावाधीन नहीं होता। ऐसे ही हम भी सुख-दुःख कि परिस्थितियों में साक्षी होकर रहे, इसी के लिए हमें सहज राजयोग सीखने कि आवश्यकता है।*
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