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क्रोध से मुक्ति पाने के लिए!
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क्रोध को कैसे छोड़े?
गुस्से को कंट्रोल कैसे करें?
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ओम शांति।
क्रोध माया का बडा विकार है। क्रोध बड़ी हिंसा है। क्रोध को अग्नि कहा जाता है। क्रोध करने वाला व्यक्ति भी जलता है, और जिस उनके ऊपर क्रोध किया वह भी दुखी होकर अंदर जलता रहता है।
क्रोध से विवेक नष्ट हो जाता है। क्रोध को भूत कहा जाता है। क्रोधी व्यक्ति दूसरों को तंग करता है। क्रोध करना पाप है क्रोध करना गलत काम है तो यह हमें नहीं करना चाहिए। क्रोध से हमारे कर्म के खाते में विकर्म बनता है। क्रोध करने से उसके साथ हमारा हिसाब बनता है। जो हमें कभी ना कभी रिटर्न करना पड़ता है। इसलिए हमें क्रोध नहीं करना ।
सामने वाला कोई गलत काम करता है। झूठ बोलता है, या चोरी करता है। हमारा नहीं सुनता है, या हमारे बारे में गलत बाते फैलाता है। तो भी हमें उसे देख कर, गुस्सा नहीं करना चाहिए। क्योंकि गुस्सा करना गलत काम है तो सामने वाला गलत है, या गलत काम कर रहा है। हम उसके ऊपर गुस्सा कर रहे हैं तो यह भी गलत काम हैं। क्योंकि
गलत गलत को ठीक नहीं कर सकता। उसको अगर हम प्यार से बताने से सुधर सकता है। लेकिन गुस्सा करने से डांटने से सुधरेगा नहीं और ही उसके अंदर ईर्ष्या, घृणा से बदले की भावना रहती है और वह कभी ना कभी बदला जरूर लेगा समय आने पर। अगर प्यार से हम किसी को बताते हैं।तो कोई भी काम कर लेता है
गलत व्यक्ति भी प्यार से बताने से रियलाइज करता है। और एक न एक दिन वह भी ठीक हो जाता है। अगर गुस्से से बताने से कोई सुधारने वाला नहीं है ,और ही हमारा खाता उसके साथ बनता रहेगा।और हमारी गुस्सा करने की आदत और ही पक्की हो जाएगी। गुस्सा करने की नेचर बन जाएगी, संस्कार बन जाएंगे। एक बारी दो बारी तीन बारी करने से कोई भी आदत पक्की हो जाती तो यह हमारे संस्कार बन जाएंगे जो छोड़ना मुश्किल हो जाएगा।
इसीलिए हमें गुस्सा नहीं करना है। हम गुस्सा करते हैं माना किसी को दुख देते हैं। और स्वयं भी दुखी होते हैं फिर पछताते हैं। क्रोध करने से स्वयं भी और जिसके ऊपर क्रोध किया वो भी डर जाता हैं। तनाव और चिंता बढ़ने लगती है,बी.पी, शुगर ,डिप्रेशन जैसी बीमारियां आना शुरू होता है।
क्रोध को दुश्मन कहां जाता है ऐसे दुश्मन को हमारे अंदर रखने से स्वयं का परिवार का और देश का बहुत नुकसान होता है। इसीलिए हमें क्रोध से मुक्त होना , उसकी प्रवेशता होने के पहले ही हमें सेफ्टी का साधन अपनाना इसमें में ही समझदारी है, भलाई है। क्रोध को छोड़ने के लिए इस तरह से अभ्यास करें।
मैं इस शरीर को चलाने वाली आत्मा हूं मैं आत्मा इस शरीर की मालिक हूं , सभी कर्मेंद्रियों की मालिक हूं और मन बुद्धि की मालिक हूं। ऑर्डर करो की मैं आत्मा मालिक हूं ,मैं आत्मा शांत स्वरूप हूं , आत्मा को बुद्धि के नेत्र से भृकुटी के बीच में देखे visualisation करे।
आत्मा ज्योति स्वरूप बिंदु रूप हूं, शांत स्वरूप हूं। शांति मुझ आत्मा का स्वधर्म है। में आत्मा इस सूर्य, चांद ,तारांगण से भी पार लाल सुनहरी प्रकाश मय देश, शांतिधाम की निवासी हूं। मुझ आत्मा के पिता परमात्मा शिव , शांति के सागर है। उनसे मुझ आत्मा में शांति की किरने आ रही है। मैं शांति से भरपूर हो रही हूं…में आत्मा नीचे इस सृष्टि मंच पर भ्रुकुटी के बीच में विराजमान हो गई।
मेरा मन शांत हो गया है।और तन भी शांत ,शीतल हो रहा है। मुझ आत्मा पर शांति के सूर्य की किरने निरंतर प्रवाहित हो रही है। और मुझसे यह शांति की किरने सारे संसार को शांत कर रही है, वायुमंडल को शांत कर रही है। ओम शांति।🌷
