बाइबिल कहती है , जो मुँह में जाता है वो मनुष्य को अशुद्ब नहीं करता , पर जो मुँह से निकलता है, वही मनुष्य को अशुद्ब करता है क्या यह बात सही है ? बाईबल पढ़ने, वचनों को समझने, चर्च जाने और प्रार्थनाओ के बाद भी यदि हमारे जीवन में वही पुरानी बातें घेरा बनाए बैठी है, तो समझ लें जीवन में शुद्धता नहीं,आज भी अशुद्धता ही पाई जाती है
यहाँ वो लोग सवाल पूछ रहे थे यीशु मसीह से ? जो खुद पूरी रीति से सिर्फ व्यवस्था पर ही चलते थे । व्यवस्था पालन तो वो अच्छी तरह से करते मगर उनके मन शुद्ब नहीं थे वो मन के काले थे ।
उनके जीवन में वो बुराईयाँ थी जो मनुष्य के शरीर के साथ साथ मनुष्य की आत्मा को भी खराब करती थी जिनसे वो दूसरों का भला नही कर पाते थे ; अपने अन्दर सिर्फ़ मूसा की व्यवस्था को ही समाए रहते व इन्सानियत उनसे कोसों दूर रहती थे ।
कहने को वो ज्ञानवान थे पर उनके जीवन बहुत ही खराब थे उनमें वो बुराइयां पाई जाती थी जो उनको परमेश्वर से दूर करती थी, इसी कारण उनके बारे में प्रभु ने कहा ; यह लोग जो मुँह से मेरा आदर करते हुए समीप आते तो है परन्तु अपना मन मुझ से दूर रखते हैं , मतलब सिर्फ सांसारिक थे उनके पास प्रेम , दया , करुँणा नाम की कोई चीज नही थी उनके मुँह से जो निकलता था वही उनको अशुद्ब करता था अब उनके मुँह से क्या निकलता था जो अशुद्ता का कारण था यह भी जान ले।
मती 15 ; 19 – क्योंकि बुरे विचार , हत्या , परस्त्रीगमन , व्यभिचार , चोरी , झूठी गवाही , और निन्दा मन ही से निकलती है यही सब मनुष्य को अशुद्ब करती है । और इसी बात को हम सबको समझने की जरूरत है ।
इन सब बुरे कामों के कारण ही व्यक्ति अशुद्ब होकर अपना सामाजिक और आत्मिक जीवन बर्बाद कर लेता है यही इस वचन की सच्चाई है जिसे समझना होगा ।
आमीन
प्रभु आपको आशीष दे
रैव्ह राजेश गिरधर

