दूसरों के लिए एक आशिष बनना

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द्वारा लिखित :   जैक पूननश्रेणियाँ :   चेले आत्मा भरा जीवन

मत्ती 14:19 में, हम वे तीन क़दम पाते हैं जो हमें दूसरों के लिए एक आशिष होने की दिशा में बढ़ाते हैं:

(1) यीशु ने सभी रोटियों और मछलियों को लिया;

(2) उसने उन्हें आशिष दी; और

(3) उसने उन्हें तोड़ा।

तब लोगों की पूरी भीड़ ने खाया। प्रभु आपको भी इसी तरह दूसरों के लिए एक आशिष बनाना चाहता है। पहले आपको उसे सभी कुछ दे देना होगा, जैसे उस छोटे लड़के ने दे दिया था। तब वह पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से आपको आशिष देगा। तब वह अनेक परीक्षाओं, झुंझलाहटों, टूटी आशाओं, नाकामिओं, बीमारियों, विश्वासघातों, आदि से आपको तोड़ेगा, आपको नम्र व दीन करेगा, और मनुष्यों की नज़र में आपको शून्य बना देगा। और तब, वह आपके द्वारा दूसरों को आशिष देगा। इसलिए जब वह आपको तोड़े, तो उसके हाथों में अपने आप को सौंप दे। बाइबल कहती है कि यीशु को पहले कुचला गया था, और फिर उसके हाथों में पिता का काम फला-फूला था (देखें यशायाह 53:10-12)

यीशु ने उसके जीवन के अलग-अलग हालातों में उसकी मानवीय स्वेच्छा को टूटने दिया था। सिर्फ इस तरह ही वह स्वयं को एक निर्दोष रूप में पिता को अर्पित कर सका था। इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए ही पवित्र आत्मा ने उसे सामर्थ्य से भरा था (इब्रानियों 9:14)। इसलिए जब आप भी पवित्र आत्मा को आपकी खुदी (स्वेच्छा) का बल तोड़ने की अनुमति देंगे, तो आप भी आत्मिक बन जाएंगे। जब भी आपकी सशक्त स्वेच्छा वह न करना चाहे जो आपके लिए परमेश्वर की इच्छा है, बल्कि वह अपनी ही मनमानी करना चाहे, तो यह बहुत ज़रूरी है कि आपकी खुदी में आपकी मनमानी (स्वेच्छा) टूटे।

आपका क्रूस उन जगहों में पाया जाएगा जहाँ परमेश्वर की इच्छा आपकी अपनी इच्छा (स्वेच्छा) का रास्ता काटेगी। उसी दोराहे पर आपकी अपनी इच्छा को क्रूस पर चढ़ना होगा। पवित्र आत्मा आपको वहाँ मरने के लिए कहेगा। अगर आप लगातार पवित्र आत्मा की आवाज़ सुनते रहेंगे, तो आप एक टूटी हुई मनोदशा में बने रहेंगे; और परमेश्वर ने उन लोगों को लगातार नया बल देने की प्रतिज्ञा की है जिनकी आत्माएं हमेशा टूटी रहती हैं। प्रभु कहता है, “मैं ऊँचे और पवित्र स्थान में रहता हूँ, और उनके संग भी रहता हूँ जो आत्मा में नम्र और दीन हैं, जिससे कि दीन की आत्मा को और नम्र हृदय को फिर से जीवित करूँ”(यशायाह 57:15 )

हर समय एक ऐसे मनोभाव में रहना अच्छा है जिसमें हमें लगातार अपनी ज़रूरत का अपनी “आत्मा की नम्रता व दीनता” का अहसास होता रहे। लेकिन आपका यह विश्वास भी होना चाहिए कि परमेश्वर ऐसे सब लोगों को भी बड़ा प्रतिफल देता है जो बड़े यत्न के साथ उसको ढूँढते हैं। अगर आप यह विश्वास नहीं करते कि परमेश्वर आपको आशिष देगा और उसके सामर्थ्य से भरेगा, तो आत्मा में नम्र व दीन होने का सारा मूल्य व्यर्थ हो जाएगा।

हरेक कलीसिया में निर्धन और निर्बल लोगों के साथ सहभागिता करने की खोज में रहें। बच्चों से बात करें और उन्हें उत्साहित करें, क्योंकि ज्यादातर लोग बच्चों को अनदेखा करते हैं। एक कलीसिया में हमेशा नीची और उपेक्षित जगहों पर ध्यान दें और ऐसी सेवकाइयों की खोज में रहें जिन पर किसी की नज़र नहीं पड़ती। किसी भी कलीसिया में अपने लिए कभी किसी महत्वपूर्ण स्थान की खोज में न रहें, और न ही अपने दान- वरदानों और प्रतिभाओं से किसी को प्रभावित करने की कोशिश करें। लेकिन हरेक सभा में साक्षी देने में साहसी हों, और जहाँ भी ज़रूरी हो कलीसिया में अपनी सेवा दें- चाहे वह ज़मीन पर झाडू लगाना या पियानो बजाना हो। एक सेवकाई हासिल करने के लिए कभी किसी के साथ प्रतियोगिता न करें। अगर आप विश्वासयोग्य रहेंगे, तो सही समय में परमेश्वर स्वयं ही आपके लिए उस सेवकाई का द्वार खोल देगा जो उसने आपके लिए रखी है।

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