द्वारा लिखित :   जैक पूननश्रेणियाँ :   जवानी Struggling चेले

आपके पास बाकी चाहे जो कुछ भी हो, लेकिन विश्वास के बिना परमेश्वर को प्रसन्न करना असम्भव है (इब्रा. 11:6)। अदन की वाटिका में हव्वा की असफलता असल में विश्वास करने की ही असफलता थी। जब वह उस पेड़ की सुन्दरता द्वारा प्रलोभित हुई थी, और तब अगर उसने सिर्फ परमेश्वर के सिद्ध प्रेम और बुद्धि में विश्वास किया होता, तो यह समझ में न आने के बाद भी कि एक प्रेम करने वाले परमेश्वर ने क्यों उस पेड़ का फल खाने से उसे रोका है, उसने पाप न किया होता। लेकिन जब शैतान ने उसे एक बार परमेश्वर के प्रेम पर शक करने वाला बना दिया, तब उसका जल्दी ही पतन हो गया।

ऐसी बहुत बातें हैं जिन्हें परमेश्वर ने हमारे लिए भी वर्जित कर रखा है, और हमारी ऐसी बहुत प्रार्थनाएं होती हैं जो जवाब देने लायक नहीं होती हैं। ऐसे समय में हमें परमेश्वर के सिद्ध प्रेम और बुद्धि में भरोसा रखना सीखना चाहिए। यीशु ने क्रूस पर भी पिता में अपना भरोसा बनाए रखा जबकि वहाँ उसे त्याग दिया गया था। उसने यह नहीं कहा था, “हे परमेश्वर, तूने मुझे क्यों छोड़ दिया?” उसने कहा, “मेरे परमेश्वर…., जिसका अर्थ था, “चाहे मुझे यह समझ “मेरे परमेश्वर…”, नहीं आ रहा है कि तूने मुझे क्यों छोड़ दिया है, तू फिर भी मेरा परमेश्वर है।” यीशु के सवाल का स्वर्ग से कोई जवाब नहीं आया था। लेकिन उसने भरोसा रखते हुए ही अपनी जान दी थी। उसने कहा, “हे पिता, मैं अपनी आत्मा तेरे हाथों में सौंपता हूँ” अंत तक दृढ़ विश्वास रखने का यह अर्थ होता है।

यीशु ने पतरस से कहा कि शैतान ने तुझे फटकने की अनुमति माँग ली है। यह वही तरीका था जिसके द्वारा शैतान ने अय्यूब को भी परखने की अनुमति माँगी थी (पुरानी वाचा में)। शैतान परमेश्वर की अनुमति बिना हमारा कुछ नहीं कर सकता (हमें प्रलोभित भी नहीं कर सकता)। लेकिन जब पतरस को फटका जाने वाला था, तो यीशु ने उसे आश्वासन दिया कि वह उसके लिए प्रार्थना करेगा कि उसका विश्वास चला न जाए (लूका 22:31,32)। सिर्फ यही ज़रूरी बात है। यीशु यह प्रार्थना नहीं करता कि हमें परखा न जाए, या हमारा स्वास्थ्य, नौकरी या हमारी धन-सम्पत्ति न मिट जाए, बल्कि सिर्फ यह कि हमारा विश्वास न चला जाए।

इसलिए, यीशु की नज़र में विश्वास हमारा सबसे बड़ा खज़ाना है। अगर हममें विश्वास होगा, तो पतरस की तरह हमारी बुरी नाकामी में भी हम हताश नहीं होंगे। हम उछल कर खड़े हो जाएंगे (उठ कर नहीं बल्कि उछल कर) और अपनी साक्षी के उस वचन के द्वारा शैतान पर जय पाएंगे जो यीशु के उस लहू के बारे में है जो हमें तब पूरी तरह शुद्ध कर देता है जब हम अपने पाप से मन फिराते हैं और उसका परमेश्वर के सम्मुख अंगीकार कर लेते हैं (प्रका 12:11)। हमें शैतान से कह देना चाहिए कि हम यीशु के लहू द्वारा शुद्ध हो चुके हैं, और परमेश्वर अब हमारे पिछले पापों को याद भी नहीं करता (इब्रा. 8:12)। हमें यह बात शैतान को हमारे मुख से बतानी होगी क्योंकि वह हमारे विचारों को नहीं जान सकता। हम इस तरह उस पर जय पाते हैं, और वह हमारे पास से भाग जाता है।

“हे मेरी बैरिन, मुझ पर आनन्द मत कर; क्योंकि ज्योंही मैं गिरूंगा त्योंही उठूंगा; और ज्योंही मैं अन्धकार में पडूंगा त्योंहि यहोवा मेरे लिये ज्योति का काम देगा। उस समय वह मुझे उजियाले में निकाल ले आएगा, और मैं उसका धर्म देखूंगा। तब मेरी बैरिन जो मुझ से यह कहती है कि तेरा परमेश्वर यहोवा कहां रहा, वह भी उसे देखेगी और लज्जा से मुंह ढांपेगी। मैं अपनी आंखों से उसे देखूंगा; तब वह सड़कों की कीच की नाईं लताड़ी जाएगी” (मीका 7:8-10)।

हमें हर समय साहस से यह कहना चाहिए, “प्रभु मेरा सहायक है। मैं कभी न डरूँगा (न किसी मनुष्य से, न किसी दुष्टात्मा से, न किसी स्थिति से, न ही और किसी बात से), क्योंकि परमेश्वर ने यह वादा किया है कि वह मुझे न कभी छोड़ेगा और न कभी त्यागेगा” (इब्रा. 13:5)। यह हमारे विश्वास का साहस-भरा अंगीकार है।

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