द्वारा लिखित :   डॉ एनी पुननश्रेणियाँ :   घर कलीसिया चेले

“मेरे साथ धैर्य रख’, उसका संगी दास गिर कर भीख मांगने लगा ” (मत्ती 18:29)। यही वह अनकही पुकार है जो गृहिणियों और माताओं के तौर पर हमारे पास उनके अन्दर से आती रहती है जिनके साथ हम रोज़ व्यवहार करते हैं। लेकिन इस आवाज़ को सुनने के लिए हमें अपनी आत्माओं में बहुत संवेदनशील होना चाहिए, क्योंकि यह पुकार अनकही होती है।

ऐसा हो सकता है कि हमारे बच्चे वह सीखने में धीमे हों जो हम उन्हें बार-बार सिखाने की कोशिश करते रहे हैं, और हम उनके साथ अधीर हो जाने की बड़ी परीक्षा में पड़ गए हैं। अगर हम सिर्फ उनकी यह अनकही पुकार सुन लें, “मेरे साथ धैर्य रखें, मैं अपनी पूरी कोशिश कर रहा हूँ कि सब कुछ सही हो जाए,” तो हमारे लिए यह आसान हो जाएगा कि हम उनकी तरफ से चिड़चिड़े हो जाने की परीक्षा पर जय पा सकें।

शायद वह नौकर जो घर के कामकाज में हमारी मदद करता है, कुछ अनाड़ी है, और ऐसा साफ-सुथरा नहीं है जैसा हम चाहते हैं, और हम उसके साथ कठोरता से व्यवहार करने की परीक्षा में पड़ जाते हैं। लेकिन उसकी अनकही पुकार यही होगी, “मेरे साथ धैर्य रखें। मुझे एक मौका और दें और मैं सुधर जाऊँगा ”। और इस तरह, हमें ज़्यादा कोमल होने का एक मौका और मिल जाता है।

या यह हो सकता है कि हमारे माता-पिता, जो बूढ़े और कमज़ोर हैं, अब हम पर निर्भर हो गए हैं। उनकी भी यही कमज़ोर और अनकही पुकार होगी, “मेरे साथ धैर्य रखो। मैं तुम्हें परेशान करना नहीं चाहता, लेकिन मुझे अभी तुम्हारी मदद की ज़रूरत है।” अगर हम उनकी भावनाओं के प्रति संवेदनशील होंगे, तो हम उनका आत्म-सम्मान मिटाए बिना, और उन्हें उनकी निर्भरता का अहसास कराए बिना, उनकी पुकार सुनेंगे और उनकी मदद करेंगे।

शायद कलीसिया में हमारी साथी बहनों का व्यवहार हमारे लिए एक परीक्षा बन जाता है। उनकी भी यही अनकही पुकार होती है, “मेरे साथ धीरज रखें। मुझमें अभी बुद्धि की बहुत कमी है।” तब हमें यह अहसास होता है कि वे भी, हमारी तरह ही, सिद्धता की तरफ बढ़ने की कोशिश कर रही हैं।

ऐसी परिस्थितियों में, हम यह पाएंगे कि हमारी शारीरिक सोच का झुकाव भी उस निर्दयी सेवक की तरह ही है। फिर भी वही समय वे समय होते हैं जब हमें फिर से यह याद करने की ज़रूरत होती है कि परमेश्वर ने हमें कितना क्षमा किया है, और कैसे दूसरों ने भी हमारी कमियों और कमज़ोरियों को धीरज से सहा है।

इसलिए हमारे आत्मिक कान हर समय धैर्य रखने कि उस पुकार को सुनने के लिए तैयार रहने चाहिए जो हमारे संगी दासों – जवानों और बूढ़ों दोनों के पास से, हमारे पास आती रहती है।

“पर धीरज को अपना पूरा काम करने दो कि तुम पूर्ण तथा सिद्ध हो जाओ, जिससे कि तुम में किसी बात की कमी न रहे” (याकूब 1:4)।

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