बवासीर (Piles) एक असाध्य रोग है। इसे हेमोरहोयड्स (Haemorrhoids), पाइल्स या मूलव्याधि भी कहते हैं। बवासीर को आयुर्वेद में अर्श यानि दीर्घकालीन प्राणघातक बीमारी कहा जाता है। बवासीर में आंत के अंतिम हिस्से या मलाशय (गुदा) की भीतरी दीवार में रक्त की धमनी और शिराओं में सूजन हो जाती है और वो तनकर फैल जाती है। मल त्याग के वक्त जोर लगाने या दवाब देने से या कब्ज के कड़े मल से रगड़ खाने से रक्त की नसों में दरार पड़ जाती है और नतीजा उसमें से खून का स्राव होने लगता है।
बवासीर में मलद्वार के पास रक्त की शिराएं फूल जाती है। हेमोरॉयडल रक्त शिराएं गुदा और रेक्टम के नीचे स्थित होती है। हेमोरॉयडल रक्त शिराओं में सूजन होने से जब यह फूल जाती है तो मल को निकलने में काफी परेशानी होती है। हेमोरॉयडल रक्त शिराएं की दीवार इतनी तन जाती है कि मल निकलने के दौरान दर्द होने लगता है और मलद्वार में खुजलाहट होने लगती है।
बवासीर (Bawasir) जब काफी गंभीर हो जाती है तो गुदा द्वार, नाभि, लिंग, अंड-कोष, चेहरा, हाथ-पैर में सूजन आ जाती है। बवासीर के मरीज को खांसी, बुखार, बेहोशी, उल्टी, खाने में अरुचि, छाती में दर्द, अधिक रक्त स्राव, कब्जियत आदि की शिकायत होने लगती है। मल द्वार पक कर उसमें पीले रंग का फोड़ा हो जाता है। असहनीय दर्द और पेट में ज्यादा गैस बनने से पूरा शरीर शिथिल हो जाता है।
बवासीर दो प्रकार का होता है- एक आंतरिक या खूनी बवासीर और दूसरा बाहरी या बादी बवासीर।
आंतरिक या खूनी बवासीर (Internal Haemorrhoids)
खूनी बवासीर में रेक्टम (Rectum) के अन्दर अर्श होता है जिसे बाहर से देखा और अनुभव नहीं किया जा सकता है। यह म्युकस मेम्ब्रेन (Mucous Membrane) से ढका होता है। ख़ूनी बवासीर में ज्यादा तकलीफ नहीं होती है, केवल मल के रास्ते से खून आता है। इसके अंदर मस्सा होता है जो बाद में बाहर आने लगता है। शौच के बाद खुद ही अंदर चला जाता है।
मस्सों से पीड़ित मरीजों को दर्द, घाव, खुजली, जलन, सूजन और गर्मी की शिकायत रहती हैं। प्रसव के दौरान जब कोई स्त्री बच्चे को जन्म देते समय अधिक ज़ोर लगाती है तब उसे भी खूनी बवासीर होने की संभावना रहती है। इस रोग से पीड़ित अधिकतर मरीज कब्ज से पीड़ित रहते हैं। इस बवासीर के कारण मलत्याग करते समय रोगी को बहुत तेज दर्द होता है और मस्सों से खून बहने लगता है। यह बहुत ही गंभीर रोग है क्योंकि इसमें दर्द तो होती ही है साथ में शरीर का खून भी व्यर्थ निकल जाता है।
बाहरी या बादी बवासीर(External Haemorrhoids)
बादी बवासीर में पेट अक्सर खराब रहता है और कब्ज बना रहता है। पेट में एसिडिटी बनती रहती है। इसमें जलन, दर्द, खुजली, शरीर मै बेचैनी, काम में मन न लगना जैसे लक्षण होते हैं। शौच कड़ा
होने पर इसमें कभी-कभार खून भी आता है। इसमें मस्सा अंदर होने की वजह से मलद्वार का रास्ता छोटा पड़ता है और दबाव से रास्ता फट जाता है और वहां घाव हो जाता है। इसे मेडिकल की भाषा में फिशर (Fissure) कहा जाता है। इसमें तेज जलन और दर्द होती है। बवासीर बहुत पुराना होने पर भगंदर हो जाता है। जिसे अंग़जी में फिस्टुला (Fistula) कहते हैं।
कारण :
• बवासीर के कारण (Causes of Piles)
खूनी हो या बादी दोनों ही बवासीर (Piles) के लिए जो कारक जिम्मेवार होते हैं वो लगभग एक ही हैं। बवासीर के कुछ अहम कारण निम्न हैं:
• कब्ज (Constipation)
बवासीर की सबसे बड़ी वजह पेट में कब्ज बनना है। कब्ज की वजह से मल सूखा और कठोर हो जाता है जिसकी वजह से उसका निकास आसानी से नहीं हो पाता। मलत्याग के वक्त रोगी को काफी वक्त तक शौचालय में उकडू बैठे रहना पड़ता है, जिससे रक्त वाहनियों पर जोर पड़ता है और वह फूलकर लटक जाती है। मल के दबाव से वहां की धमनियां चपटी हो जाती हैं और झिल्लियां फैल जाती हैं। जिसके कारण व्यक्ति को बवासीर (Haemorrhoids) हो जाती है।
• तला-भुना हुआ भोजन (Fried and roasted food)
ज्यादा मिर्च- मसाले, तली हुई और चटपटी चीजें खाने, मांस, अंडा, रबड़ी, मिठाई, मलाई जैसे देर से पचने वाले भोजन करने से भी बवासीर रोग होता है। आवश्यकता से अधिक भोजन करना भी बवासीर का प्रमुख कारण है।
• गर्म पानी (Hot water)शौच करने के बाद मलद्वार को गर्म पानी से धोने से भी बवासीर रोग हो सकता है।
• दवाइयां (Medications)दवाइयों का अधिक सेवन करने के कारण भी बवासीर (Bawasir) रोग हो सकता है। खासकर डिस्पेपसिया और किसी जुलाब की गोली का अधिक दिनों तक इस्तेमाल करने से।
• नींद में कमी (Insomania)नींद पूरी नहीं होने के कारण पेट में खाना सही तरह से पच नहीं पाता और नतीजा कब्ज हो जाता है। कब्ज से बवासीर की शिकायत हो जाती है।
• आनुवांशिकता (Heridetry)बवासीर (Bawasir) की बीमारी आनुवांशिक है। अगर परिवार में आपके दादा-दादी, नाना-नानी, माता-पिता किसी को भी बवासीर थी या है तो आपको भी यह बीमारी हो सकती है। यह रोग पीढ़ी दर पीढ़ी होता रहता है।
• अन्य वजहें (Other Causes of Piles)
- गर्भावस्था मे भ्रूण का दबाब पड़ना। – शराब और अन्य नशीले पदार्थों के सेवन से भी बवासीर होता है। – बवासीर गुदा के कैंसर की वजह से या मूत्र मार्ग में रुकावट की वजह से या गर्भावस्था में भी हो सकता है। लक्षण : • खुजली मलाशय में अटकने की अनुभूति • खूनी बवासीर में गुदाद्वार के अंदर सूजन होती है
• खूनी बवासीर में मस्से खूनी सुर्ख होते है और उनसे खून गिरता है
• दर्द एवं रक्तस्राव
• बवासीर में जलन तथा दर्द होने लगता है
• बादी बवासीर में मस्से काले रंग के होते हैं
• बाहरी बवासीर में गुदाद्वार के बाहर की ओर के मस्से मोटे-मोटे दानों जैसे हो जाते हैं
• मनोविकार
• मलावरोध
• मस्सों में खाज और सूजन होती है। आयुर्वेदिक उपचार : बवासीर के लिए घरेलू उपाय Home Remedies for Piles
• मूली का नियमित सेवन बवासीर को ठीक कर देता है।
• रात को सोते समय केले खाने चाहिए इससे रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है।
• पालक, बथुआ, पत्ता गोभी, चौलाई, सोया, काली जीरी के पत्ते का साग खाना चाहिए।
• रोगी व्यक्ति को सुबह तथा शाम के समय 2 भिगोई हुई अंजीर खानी चाहिए और इसका पानी पीना चाहिए।
• त्रिफला का चूर्ण लेना चाहिए। ऐसा कुछ दिनों तक करने से बवासीर रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
• 2 चम्मच तिल चबाकर ठंडे पानी के साथ प्रतिदिन सेवन करने से बवासीर कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
• रोगी व्यक्ति को अपने भोजन में चुकन्दर, फूल गोभी और हरी सब्जियों का बहुत अधिक उपयोग करना चाहिए।
• हरी सब्जियों में परवल, पपीता, भिंडी, केला का फूल, मूली, गाजर, शलजम, करेला, तुरई खाना चाहिए।
• गुड़ में बेलगिरी मिलाकर खाने से रोगी व्यक्ति को बहुत अधिक लाभ मिलता है और बवासीर रोग ठीक हो जाता है।
• पका पपीता, पका बेल, सेब, नाशपाती, अंगूर, तरबूज, मौसमी फल, किशमिश, छुआरा, मुनक्कात, अंजीर, नारियल, संतरा, आम, अनार खाना बवासीर में फायदेमंद होता है।
• मस्सों पर सरसों का तेल लगाना चाहिए, फिर इसके बाद अपने पेड़ू पर मिट्टी की पट्टी करनी चाहिए और इसके बाद एनिमा लेना चाहिए तथा मस्सों पर मिट्टी का गोला रखना चाहिए।
• रात को 100 ग्राम किशमिश पानी में भिगो दें और इसे सुबह के समय में इसे उसी पानी में इसे मसल दें। इस पानी को रोजाना सेवन करने से कुछ ही दिनों में बवासीर रोग ठीक हो जाता है।
• नींबू को चीरकर उस पर चार ग्राम कत्था पीसकर बुरक दें और उसे रात में छत पर रख दें। सुबह दोनों टुकड़ों को चूस लें, यह खूनी बवासीर की उत्तम दवा है।
• चोकर समेत आटे की रोटी, गेहूं का दलिया, हाथ कुटा- पुराना चावल, सोठी चावल का भात, चना और उसका सत्तू, मूंग, कुलथी, मोठ की दाल, छाछ का नियमित सेवन करना चाहिए। बचाव : • सबसे पहले कब्ज को दूर कर मल त्याग को सामान्य और नियमित करना आवश्यक है। इसके लिये तरल पदार्थों, हरी सब्जियों एवं फलों का बहुतायात में सेवन करें। बादी बवासीर (Haemorrhoids) के मरीज तली हुई चीज़ें, मिर्च-मसालों युक्त भोजन न करें।
• रात में सोते समय एक गिलास पानी में इसबगोल की भूसी के दो चम्मच डालकर पीने से भी लाभ होता है।
• गुदा के भीतर रात में सोने से पहले और सुबह मल त्याग के पूर्व मलहम लगाना भी मल निकास को सुगम करता है।
• गुदा के बाहर लटके और सूजे हुए मस्सों पर ग्लिसरीन और मैग्नेशियम सल्फेट के मिश्रण का लेप लगाकर पट्टी बांधने से भी काफी आराम मिलता है और फायदा होता है।
• मस्सों को हटाने के लिए भी कई विधियां उपलब्ध है। मस्सों में इंजेक्शन द्वारा ऐसी दवा का प्रवेश किया जाता है जिससे मस्से सूख जाते हैं।
• मस्सों पर एक विशेष उपकरण द्वारा रबर के छल्ले चढ़ा दिए जाते हैं, जो मस्सों का रक्त प्रवाह रोककर उन्हें सुखाकर निकाल देते हैं।
• एक अन्य उपकरण द्वारा मस्सों को बर्फ़ में परिवर्तित कर नष्ट किया जाता है।
• सर्जरी द्वारा भी मस्सों को काटकर निकाल दिया जाता है।
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