स्वाइन फ्लू या H1N1 (H1N1 Flu) एक संक्रमण है, जो इन्फ्लूएंजा ए वायरस (Influenza Virus) के कारण होता है। आमतौर पर यह बीमारी सूअरों में होती है, इसलिए इसे स्वाइन फ्लू कहा जाता है, लेकिन कई बार सूअर के सीधे संपर्क में आने पर यह मनुष्य में भी फैल जाती है। यह बहुत जल्दी फैलने वाला रोग है। इससे बचने के लिए संक्रमित लोगों से दूर रहना चाहिए।
स्वाइन फ्लू वर्ष 2009 में भी फैला था जिसके कारण देश भर कई लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी। हालांकि, वर्ष 2015 में फैल रहा स्वाइन फ्लू का वायरस पिछली बार की तुलना में कम घातक है। स्वाइन फ्लू के वायरस से संक्रमित मरीज में लक्षण नजर आने से लेकर अगले सात दिनों तक इसका संक्रमण बना रहता है। साथ ही इससे जुड़ा एक तथ्य यह भी है कि स्वाइन फ्लू सर्दियों में अधिक प्रभावी होता है।
बचाव :
• संक्रमित लोगों से दूर रहना ही इस बीमारी का बचाव है।
• साफ-सफाई का ध्यान रखना बेहद जरूरी है।
• खांसते या छींकते समय रुमाल का प्रयोग करें।
• गंदे हाथों से आंख, नाक या मुंह छूने से बचें और बाहर खाने से परहेज करें।
• बीमार लोगों से नज़दीकी संपर्क रखने से बचें
• अस्पताल या अन्य किसी सार्वजनिक स्थान पर जाने से पहले मास्क पहनें।
• संक्रमित व्यक्ति के पास जाना अगर जरूरी हो तो मास्क के साथ-साथ दस्ताने भी पहनें। इससे आप बीमारी से सुरक्षित रह सकते हैं।
• स्वाइन फ्लू से बचने के लिए भारत में स्वाइन फ्लू वैक्सीन मौजूद है। स्वाइन फ्लू की वैक्सीन एक साल तक इस बीमारी से आपकी रक्षा करती है।
• स्वाइन फ्लू के लक्षण नज़र आने पर मरीज को तुरन्त अस्पताल में भर्ती करा दें ताकि उसका सही इलाज हो सके।
• यदि आप इन्फ़्लुएन्ज़ा से पीड़ित हों तो आप अन्य लोगों को संक्रमण से बचाने के लिए उनसे दूर रहें।
• संक्रमित लोगों के संपर्क में रहने से आप बार-बार इस बीमारी के शिकार हो सकते हैं।
कारण :
• संक्रमित सूअरों के साथ रहने वाले व्यक्ति स्वाइन फ्लू की चपेट में आ सकते हैं तथा आगे चलकर वे व्यक्ति अन्य लोगों को संक्रमित कर सकते हैं।
• बीमारी के होने का खतरा बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और दिल, किडनी, डायबिटीज से ग्रस्त लोगों में अधिक रहता है। जिनकी रोग-प्रतिरोधक क्षमता कम होती है, वे भी स्वाइन फ्लू का शिकार हो सकते हैं।
• यहां यह ध्यान रखने वाली बात है कि सही तरह से पके हुए रेड मीट से स्वाइन फ्लू नहीं होता लेकिन अगर पकाने में असावधानी बरती जाए तो कुछ समस्याएं अवश्य आ सकती हैं।
लक्षण :
• H1N1 के रोगियों को बहुत ज्यादा थकान महसूस होती है।
• H1N1 में पीड़ित व्यक्ति मांसपेशियां में दर्द, अकड़न और पीड़ाओं की तीव्रता बहुत अधिक महसूस करता है।
• H1N1 से पीड़ित 80 Percentage रोगियों को ठंड बहुत लगती है।
• H1N1 से पीड़ित व्यक्ति सूखी खांसी, बहती नाक से परेशान रहता है।
• लगभग 80 Percentage H1N1 मामलों में रोगी बुखार से तपता रहता है। बुखार में शरीर का तापमान 101 डिग्री तक पहुंच जाता है। दवा खाने के बाद भी बुखार का लगातार बढ़ता है।
• लगातार सर में दर्द होना H1N1 का एक आम लक्षण है तथा यह लक्षण 80% मरीजों में मौजूद होता है।
आयुर्वेदिक उपचार :
स्वाइन फ्लू ने पहले मैक्सिको में अपना पांव पसारा, उसके बाद पूरे अमेरिका और भारतीय उप महाद्वीप में फैलते हुए महामारी का रुप ले लिया। अंग्रेजी में एक कहावत है न – “Prevention is better than cure”। स्वाइन फ्लू में भी बचाव ही एक मात्र इलाज है। स्वाइन फ्लू का वायरस सीधे श्वास नली पर आक्रमण करता है और यह खतरनाक रुप से संक्रामक हो जाता है।
खास कर H1N1 वाइरस जो कि जानलेवा भी है और काफी संक्रामक भी। यह बच्चे, जवान और बूढ़े किसी पर भी अटैक कर सकता है और काफी तेजी से फैलता है। मौसमी सर्दी-कफ और खांसी में छींकने-खांसने के दौरान इसके वायरस हवा में तैरने लगते हैं। इसके वायरस दरवाजे, सिंक, खिड़की, कपड़े, रूमाल, तौलिया या कहीं पर भी हो सकते हैं। इसके संपर्क में आते ही कोई भी संक्रमण का शिकार हो सकता है।
जरुरी नहीं है कि H1N1 वायरस के संक्रमण के तुरंत बाद कोई बीमार पड़ जाए। सात दिन के बाद भी इसके लक्षण दिखाई देते हैं और मरीज बीमार पड़ने लगता है। बच्चों में 10 दिन के बाद भी लक्षण दिखाई दे सकते हैं। इसके लक्षण सीजनल फ्लू की तरह ही होते हैं, मसलन- कफ, बुखार, गला सूखना, नाक बहना, छींक आना, सिरदर्द, बदन दर्द, कंपकंपी के साथ बुखार आना और बदन में अकड़न होना।
स्वाइन फ्लू में निमोनिया का खतरा रहता है और श्वसन प्रणाली नाकाम होने का डर रहता है जोकि जानलेवा है। स्वाइन फ्लू पिछले साल भारत में महामारी की तरह पांव पसारा, खासकर गुजरात, राजस्थान में इससे कई लोगों की मौत भी हुई।
• तुलसी (Basil)
तुलसी में रोग प्रतिरोधी क्षमता को मजबूत करने की शक्ति होती है और किसी भी तरह के फ्लू में यह रामबाण की तरह काम करता है। यह गले और फेफड़े को किसी भी तरह के संक्रमण से बचाता है। सुबह खाली पेट 5-10 तुलसी के पत्ते को अच्छी तरह से धो कर चबा लें। चाय और काढ़े में भी तुलसी का सेवन कर सकते हैं।
• गिलोय (Tinospora Cordifolia)
गिलोय का पौधा आसानी से हर जगह मिल जाता है। गिलोय के पौधे का तना काटकर उसे अच्छी तरह से छोटे-छोटे टुकड़े कर लें। गिलोय के तना के टुकड़े और पांच-छह तुलसी के पत्तों को पानी में उबाल लें। अब इसमें काली मिर्च, सेंधा नमक या काला नमक मिला लें और इसे गरमा-गरम काढ़े की तरह पी लें। यह आपके रोग से लड़ने की क्षमता को तो मजबूत करेगा ही, संक्रमण से भी रक्षा करेगा।
• कपूर (Camphor)
स्वाइन फ्लू से बचाव के लिए कपूर काफी कारगर है। वयस्क महीने में एक बार या दो बार फ्लू के सीजन में इसका सेवन कर सकता है। जवान लोग तो इसे पानी के साथ भी खा सकते हैं लेकिन बच्चों को केले में कपूर मथ कर खाने देना चाहिए। बच्चे सीधे कपूर नहीं खा सकते। ध्यान रहे कपूर का सेवन हर रोज न करें। फ्लू के सीजन में एक या दो बार ही इसका सेवन काफी है।
• लहसुन (Garlic)
लहसुन तो वैसे भी हर मर्ज की दवा है। इससे इम्यूनिटी मजबूत होती है और संक्रमण का खतरा कम रहता है। रोज सुबह खाली पेट लहसुन की दो डली कच्चा ही पानी के साथ खाएं, काफी फायदा करेगा।
• हल्दी-दूध (Turmeric with Milk)
हल्दी में कई तरह के गुण होते हैं। दर्द निवारक के साथ-साथ यह कफ-खांसी-सर्दी में तो असर करता ही है, रोग प्रतिरोधी क्षमता को भी मजबूत करता है। रोज रात को गर्म दूध में हल्दी डाल कर पीने से फ्लू और संक्रमण का खतरा कम रहता है।
• साफ-सफाई (Hygine)
वायरल संक्रमण बहुत तेजी से फैलता है और वायरस कहीं भी हो सकता है। किसी भी चीज को छूने या कहीं बाहर जाने के बाद तुरंत पानी और एंटी सेप्टिक लोशन या लिक्विड से हाथ पैर धोने के बाद ही कुछ खाना-पीना चाहिए। सीजनल फ्लू के महीनों में नाक पर मास्क या रुमाल लगा कर बाहर निकलना चाहिए।
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