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ब से बनारस, मस्ती और महादेव की नगरी शुरुआत बनारस से क्योंकि बनारस शुरू से है। शहरों के बनने की शुरुआत से। बनारस मौज का शहर है मस्ती का शहर है। बाबा भोले के नशे में चूर अलमस्त शहर। मैंने नदियों के किनारे बसे बहुत से ऐतिहासिक सांस्कृतिक से दिखने वाले दकियानूसी नकली शहरों को भी देखा है। बनारस वैसा नहीं है। बनारस आपसे बहस नहीं करता है । वो जैसा है वैसा ही रहता है। आपको पसंद आए या ना आए। या तो आप बनारस के होते हैं या रंग बनारसी आप पर स्वयं चढ़ जाती है। बनारस ने अपनी यह संस्कृति खुद विकसित की है न ओढ़ी है न उधार मांगा है। इस शहर का मिज़ाज सबसे अलहदा है। शायद यही वजह है कि बनारस मुझे बेहद पसंद आता है। बनारसी चरित्र पसंद आता है। नदियों के किनारे बसे शहरों को देखकर अक्सर इंसान के अंदर दर्शन उभर आता है सोच गहरी हो जाती है। ये दर्शन उन शहरों को आम आदमी की पहुंच से दूर कर देता है। ऐसे में वह शहर लोगों को फिर नहीं समझ आता। इस तरीके का भाव उन शहरों को एक ख़ास तबके और एक ख़ास परिभाषा में बांध देता है।उसी तरह हरिद्वार सबको समझ नहीं आता है। वहां गंगा ज्यादा दिव्य और ज्यादा दूर-सी दिखती है। गंगोत्री, हरिद्वार, उज्जैन अनेक उदाहरण हैं, जो बहुत दिव्य हैं, पवित्र हैं, ऊर्जावान हैं, पर मस्त नहीं है। उनके लिए ये सब उदाहरण कठिन भी लगते हैं।संभवतः उन्हें समझना भी कठिन काम है। इनके उलट बनारस सरल है। वह अपने कठिन होने का एहसास आपको नहीं कराता है। घमंड नहीं दिखाता है, जिसको जितना समझना है, उसको उतना ही समझ आएगा। हर व्यक्ति को ऐसा लगेगा गोया बनारस इतना ही है, जितना उसे समझ आया। यह खासियत बनारस की है। सबको अपनी-अपनी दृष्टि से बनारस पूरा समझ आता है। पर आप उसे कितना भी कम समझें, बनारस आपको पूरा समझ लेता है। पूर्व और पश्चिम का मिलन द्वार बनारस पूर्व और पश्चिम भारत के मिलने का द्वार भी है। आज का गरीब पूर्वी भारत और धन का अमीर पश्चिमी भारत दोनों बनारस में मिलते है तो दोनों गायब हो एकमेक हो जाते है। दोनों बनारसिया उर्फ बनारसी हो जाते है। गरीब और अमीर का सबसे कम अंतर बनारस में ही नजर आता हैं। सैकड़ों धाराओं का मिलन स्थल बनारस। दक्षिण भारत से आए पुजारी उत्तर भारत(बनारस) के मंदिरों में घंटा बजा कर हिन्दी /संस्कृत की आरती/उद्घोष पढ़ते है। मारवाड़ी समाज जहाँ मस्ती में भी व्यापार पनपा देता है। मृतक को जलाने में रोजगार के अवसर जहाँ हो वो बनारस है। विरुध्दों का ऐसा सामंजस्य अन्यत्र दुर्लभ है।बनारस में एक अलग किस्म की बेफिक्री है, सब महादेव भरोसे। मुझे यह बेफिक्र-सी मस्ती बनारस में ही दिखी है। यह शहर जितना पुराना है उतना ही खुद में मस्त, अपनी धुन में सवार है। अच्छा! बनारस सबकी पहुँच में रहता है। अपने तमाम कर्मकांडों, संस्कारों के बीच बनारस में एक ठिठोली एक किस्म का छिछोरापन भी छुपा हुआ है, जो क्रोध नहीं पैदा करता बल्कि बरबस ही मुस्कुराने पर मजबूर कर देता है। यहाँ के घाटों पर जाकर देखिए, वहाँ रुकिए, उनको समझिए वह बात करते लगते हैं, गंगा माई की लहरों के साथ एक पूरा इतिहास उनसे गुजरता है और वहीं पूरा शहर बनारस आपको उन्हीं घाटों पर कुछ ना कुछ करते नजर आएगा। नदियों के किनारे बसे दूसरे सांस्कृतिक घाटों पर ऋषि-मुनि-सन्तजन तपस्या करते नजर आते हैं। लगता है कि जैसे मोक्ष यही मिलेगा इसी साधना से मिलेगा। एक साथ मंदिर की घण्टियाँ आरती के कर्णप्रिय गूंज के साथ साँझ के धुंधलके के साथ अजान की उठती आवाज बनारस को और विशिष्ट बनाती है। घाट की संगत, चिलम और दर्शन इधर एक जुमला चलता है – राँड़ सांढ़ सीढ़ी संन्यासी, इनसे बचे तो सेवें काशी। पर इन चारों के अतिरिक्त बनारस के घाटों पर चिलम भी एक अनिवार्य उपस्थिति है। बनारस के घाटों पर क्या साधु-संत, क्या आम आदमी, क्या अमीर, क्या गरीब सब के सब चिलम पी रहे होते हैं। एक पूरा जीवन नर्तन करता है इन घाटों पर। कोई फोटो खींचता है, कोई चित्र बनाता है। कोई कल्पना में डूबा होता है तो कोई भविष्य के खाके खींचने में मगन, सब के सब अपने-अपने नशे में चूर। जिसके पास कुछ नहीं है, वो भी चिलम मार रहा होता है, क्योंकि उसके पास तो वैसे भी कुछ है नहीं तो चिंता काहे की। जो करोड़ों अरबों की संपत्ति कूट चुका है वो एक अलग तरह की मानसिक चिंता में होता है, उस मानसिक विकृति के शिकार जीव में यह चिलम जीवन का अलग दर्शन सिखाता है जीवन के होने और ना होने के सारतत्व को यही बनारस के घाट समझा देते हैं। काशीनाथ सिंह ने यूँ ही ‘काशी का अस्सी’ नहीं लिखा मारा था। घाटों में अस्सी की महिमा तो अपरंपार है। ‘सुबह ए बनारस’ तो हमने हमेशा से सुना है लेकिन इसकी एक दार्शनिक छवि हिंदी के बड़े कवि केदारनाथ सिंह ने भी खींची है –इस शहर में वसंत अचानक आता है और जब आता है तो मैंने देखा है लहरतारा या मडुवाडीह की तरफ़ से उठता है धूल का एक बवंडर और इस महान पुराने शहर की जीभ किरकिराने लगती है…कभी सई-साँझ बिना किसी सूचना के घुस जाओ इस शहर में कभी आरती के आलोक में इसे अचानक देखो अद्भुत है इसकी बनावट यह आधा जल में है आधा मंत्र में आधा फूल में है आधा शव में आधा नींद में है आधा शंख में, अगर ध्‍यान से देखो तो यह आधा है और आधा नहीं भी है…यह भी बनारस है। सब बनारसिया, न उधो न माधो सब महादेव बनारस की एक और ख़ास बात है यहाँ सब बराबर होते हैं। कोई ऊंच नहीं कोई नीच नहीं। सब परेशान आते है पर यहाँ आकर अपनी सब परेशानी भूल जाते है। बनारस आपकी परेशानी का इलाज करने वाला हकीम की दुकान नहीं है। बनारस परेशानी के साथ मस्त रहना जीवन को उसकी मुकम्मल हालत में जीने का अर्थ सीखने का नाम है। लोग बनारस से रहना सीखते है रस-भरा जीवन जीना सीखते हैं। गालियां बनारस की संस्कृति है सच कहें तो बनारस की लोकसंस्कृतिक धारा का एक नमूना। जरा सोचिए! कितना मस्त शहर होगा कितने बिंदास लोग होंगे कि उनलोगों में नाममात्र की ऐंठ भी नहीं होती और एक दूसरे से मिलते ही एक दूसरे का अभिवादन महादेव से शुरू कर भोंसड़ी के से करते हैं। यह प्यार, विनम्रता और लहरिया उच्चारण से भरा वाक्य – “अरे ओ भोसडी के! जरा इधर आओ सारा ज्ञान उधरे टपका दोगे का बे?” बनारस का मित्रभाव है। मेरा दावा है किसी और शहर, किसी और लोकसंस्कृति में जाके इस तरह से बोलिए यकीन दंगा हो जाएगा। यह है खालिस बनारस।बनारसी खाली पीली नकली जिंदगी नहीं जीते है। बनारसी जीवन के अंतिम और शाश्वत सत्य को सैकड़ों हजारों साल पहले से समझ चुके हैं। इसलिए उनमें किसी से द्वेष, अहंकार और कटुता नहीं है। सब एक अलग किस्म के नशे में। मस्त हैं। बनारस में कोई तपस्या नहीं करता। बनारस को कोई ऋषि मुनि हाईजैक नहीं कर पाया। यहाँ बाबा भोले के नशे मै डूबने को ही मोक्ष प्राप्ति माना जा चुका है। व्यक्तिगत तौर पर मुझे बनारस का छिछोरा पन पसंद आया है। पंडितों का पाखंड बनारस में भी है पर बनारस पर किसी का एकाधिकार नहीं है। बिना रस के जीवन जी रहे पश्चिम के लोगों को बनारस क्यों भाता है बनारसिया ज्ञान की वजह से तो कतई नहीं। पर पश्चिम के लोगों को घोर आश्चर्य होता है यह देखकर कि ये कौन-सी कैसी दुनिया है। यहां इतना कष्ट है, परेशानी है, गरीबी है पर सब प्रसन्नचित्त क्यों है? यह बनारसी खुशी उन आधुनिक कहे जाने वाले देशों के लोगों को पचती नहीं है। पश्चिम का एक तबका है जो कहता है बनारस गंदा है लेकिन बनारस अपनी धारा में अलमस्ती में बेफिक्र बेलौस जीता रहता है ऐसे लोग बनारस का कुछ न बिगाड़ पाए, न उसकी छवि , ना उसका ढब। गंगा गंदी नहीं यहाँ, औघड़ दृष्टि से देखो गंगा की बरसाती मिट्टी गंदी नहीं होती है। गंदा और साफ इसका अंतर हमे अपने हिसाब से ढूंढना होगा। मुझे तो तब बहुत ही ज्यादा गंदा लगता है,जब तथाकथित विकसित राष्ट्रों के लोग शौच के बाद पानी भी नहीं मारते हैं। कितना अजीब है ये सोचना। गंगा की गाद गंदी नहीं होती है, हो सकता है वह अच्छी ना दिखे। पर गंदा तो वो हुआ ना जो आपको आपके स्वास्थ्य को आपके पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए? मुझे तो पश्चिम का बनाया प्लास्टिक गंदा लगता है। ना जाने इस प्लास्टिक ने कितने लोगों को कैंसर जैसी बीमारियां दी है। प्लास्टिक दिखता अच्छा है पर यह हमारे आपके स्वास्थ्य और इस पर्यावरण के सेहत के लिए बेहद गंदा है। यहाँ गोबर कूड़ा नहीं लोक की उपस्थिति है बनारस में गोबर का सड़क पर डला रहना आम है। ऐसा कतई नहीं कहा जा रहा है कि उसको सड़क पर ही होना चाहिए। पर गोबर गंदा नहीं है, यह सत्य है। सड़क पर डला होना तंत्र के ऊपर पड़ते बोझ का असर है। वरना जब फर्टिलाइजर बने भी नहीं थे तब से हम गोबर को इक्कठा कर खेतों में डालते थे। घरों को लीपते थे। समझना बस इतना है कि गंदा क्या होता है और किसके लिए। नीम की दातुन गंदी लगती है दिखने में और प्लास्टिक के ब्रश साफ तथा सुंदर भी, पर नीम गंदी होती नहीं है, आपके स्वास्थ्य के लिए तो कतई नहीं। कुल्हड़ वाली दूध जलेबी कुल्हड़ में दूध जलेबी, रबड़ी बनारस में खाइए उससे पवित्र और साफ कुछ नहीं होता है। प्लास्टिक / पॉलीथीन पैकिंग में जलेबी खाना या उसका साफ नजर आना, मन का भ्रम है। हमने अपना चश्मा बदल लिया है, इसलिए ऐसा दिखता है। जमीन पर गिर टूटे-फूटे मिट्टी के कुल्हड़ की फोटो देखा कर बोला जाता है कि बनारस गंदा है। मिट्टी कैसे गंदी हो सकती है? फिर तो आप हम सब तो मिट्टी से ही मिल कर बने है कितना साफ करेंगे खुद को केमिकल्स की साबुन से? सिर्फ केमिकल ही रह जाएगा, अगर मिट्टी से इतनी नफरत करेंगे तो। है बहुत कुछ खास यहाँ बनारस में बहुत कुछ छुपा है, उसे निकालने के लिए आपको बार-बार बनारस जाना पड़ेगा। जितनी बार जाएंगे, उतना नया जानेंगे। जितना ज्यादा जानेंगे बनारस उतना नया लगेगा। यह शहर बनारस आधुनिकता और पौराणिकता के सवारी एक साथ कर रहा है। आपको कभी ज्यादा आधुनिक होना का छलावा लगे तो बनारस जाके पुराने हो जाइए और अपनी सांस्कृतिक धरोहर पर गर्व कीजिए। जीवन बेहद खास है और यह समय आपको रुककर खुद के से मुलाकात का मौका नहीं देता बनारस आपसे अपने होने का परिचय कराता है। यह आपकी अपने रस में डुबो अपना बना लेता है-“ताकि बना रहे आपके जीवन में सदैव रस।इसलिए जाते रहिए बनारस” साभार (Source) -…