परमेश्वर ने मनुष्य को माटी की धूल से सृजा था| *माटी का बर्तन ,क्या खोना , क्या पाना है ; इक दिन माटी में मिल जाना है| फ़िर भी मनुष्य को घमंड अवश्य होता है| माटी के बर्तन को , सोने से मढ़ो या चाँदी से ; एक दिन टूट जाना ही ,इसकी नियति है|*
मनुष्य ज्ञानवान हो या अनजान ; अंत को बदला नहीं जा सकता| माटी का बर्तन टूटते ही , सब कुछ बिख़र जाता ; टूटे हुए बर्तन का कोई मोल नहीं रहता| *मनुष्य शक्तिशाली हो ; रूपवान हो या धनवान| माटी के बर्तन पर घमंड , मूर्खता है*
2कुरिन्थियों 4:7 पौलूस कहता है —हमारे पास यह धन , माटी के बर्तनों में रखा है , कि यह असीम सामर्थ्य , हमारी ओर से नहीं परन्तु परमेश्वर की ओर से ठहरे| *परमेश्वर हमारी नियति से परिचित है , फ़िर भी वह , माटी के बर्तनों में स्वर्गीय धन रखता है| यह धन संजो कर रखने के लिए नहीं , बांटने के लिए है| माटी का बर्तन आप और हम हैं| क्या आपके और हमारे अन्दर , परमेश्वर ने स्वर्गीय धन रखा है? इसके पूर्व की यह बर्तन टूट कर व्यर्थ हो जाये , क्या आप इस धन को दूसरों में बांटने के लिए ,तैयार हैं? जिनके पास यह धन है , वोही वास्तव में धनवान हैं|*
आमीन
प्रभु आपको आशीष दे
रैव्ह राजेश गिरधर

