*दुनियां में सबसे मुश्किल है, अपना गुनाह कबूल करना| गुनाह छिपाना, इंसान की फ़ितरत है| दूसरों को पता चल भी जाए, तो कबूल करना मुश्किल है|* गुनाह के साथ दो बातें जुड़ी हैं ; सज़ा और बदनामी| इंसान सज़ा से ज़्यादा, बदनामी से डरता है| ख़तरनाक क्या है, सज़ा या बदनामी?आप किस से बचना चाहते हैं, सज़ा से या बदनामी से| *गुनाह इंसान से छिपाया जा सकता है, ख़ुदा से नहीं| हम इन्सान और ख़ुदा दोनों के
गुनाहगार हैं| छिपा हुआ गुनाह, एक बोझ होता है| गुनाह क़बूल करने के लिए, शब्दों की ज़रूरत नहीं पड़ती| वो स्त्री अपने आंसुओं से यीशु के क़दमों को भिगो रही थी| पतरस इन्कार के बाद ज़ार-ज़ार रोया| आंसू ही उनका कबूलनामा थे| कोई समझे न समझे, ख़ुदा आंसुओं की जुबां समझता है| ग़लती मानकर सुधार लेना, ज़्यादा बेहतर है| इससे रिश्ते भी सुधर जाते हैं| दिमाग़ को कड़वाहट से नजात मिल जाती है|
आमीन
प्रभु ही हमारे गुनाहों को क्षमा करने वाला है
रैव्ह राजेश गिरधर

