प्रभु यीशु को स्वीकार करना यानी अपने जीवन का सबसे बड़ा फैसला लेना…. प्रभु यीशु को ग्रहण करने के लिये हमें अपने पापों से मन फिराना पड़ता है l हमें परमेश्वर प्राय्शिचत प्रदान करते हैँ, और पवित्र आत्मा हमें निरुत्तर करता है की हमने पाप किया है और हमें आवश्यकता है की हमारे पापों से मन फिराए.. तो जब हम स्वेच्छा से पापों से मन फिरा के प्रभु यीशु से माफ़ी मांग कर उन्हें अपना एक मात्र प्रभु और उध्दारकर्ता स्वीकार करते हैँ तो उसी समय हमारा उद्धार होता है, और उद्धार के समय ही हमें पवित्र आत्मा मिल जाता है, जो हमारी मरी हुई आत्मा को जीवित करता है और सदा के लिये हम में निवास करता है l पवित्र आत्मा का कार्य है हमें जीवन भर पापों से अलग रखना है l पाप के स्वभाव से हमारे अंदर तो मरते दम तक पाप होते रहेंगे लेकिन पवित्र आत्मा हमें निरुत्तर करेगा जीवन भर और हम पाप से दूर होने लगेंगे... परमेश्वर के अनुसार — – झूठ बोलना , चोरी करना, खून करना, व्यभिचार करना, झूठी शपथ खाना, अनाज्ञाकारिता, अश्लीलता, जलन, द्वेष भावना, लालच.. ये सब पाप हैँ…. परमेश्वर इन सभी कार्य से घृणा करता है और अगर किसी ने यीशु को स्वीकार किया है तो पवित्र आत्मा उसे इन सभी पापों से बाहर निकलता है….
आमीन
प्रभु यीशु को ही पाप क्षमा करने का अधिकार है
रैव्ह. राजेश गिरधर

