दुनियां में बहुत से काम कठिन हैं , मगर सबसे मुश्किल है , अपना गुनाह कबूल करना| गुनाह छिपाना , इंसान की फ़ितरत है| दूसरों को पता चल भी जाए , तो कबूल करना मुश्किल है| गुनाह के साथ दो बातें जुड़ी हैं ; सज़ा और बदनामी| इंसान सज़ा से ज्यादा बदनामी से डरता है| अहम् सवाल है , ख़तरनाक क्या है, सज़ा या बदनामी?आप किस से बचना चाहते हैं , सज़ा से या बदनामी से| यीशु ने कहा:-, हे बोझ से दबे हुए लोगो मेरे पास आओ| गुनाह इंसान से छिपाया जा सकता है , ख़ुदा से नहीं| हम इन्सान और ख़ुदा दोनों के गुनहगार हैं| छिपा गुनाह , एक बोझ होता है| 

याकूब 5=16 के अनुसार:- , एक दूसरे के सामने अपने अपने गुनाहों को मान लो| अंगीकार विवेक को , बोझ से आज़ाद करता है| गुनाह कबूल करने के लिए शब्दों की ज़रूरत नहीं पड़ती| वो स्त्री आंसूओं से यीशु के क़दमों को भीगो रही थी| पतरस इनकार के बाद ज़ार ज़ार रोया| आंसू ही उनका कबूलनामा थे| कोई समझे न समझे , ख़ुदा आंसूओं की भाषा समझता है| अय्यूब 31=3में लिखा है —यदि मैंने आदम के जैसे अपना गुनाह छिपा कर , अपने अधर्म को ढांप लिया हो| ग़लती मानकर सुधार लेना , ज्यादा बेहतर है| इससे रिश्ते भी सुधर जाते हैं| दिमाग़ को कड़वाहट से भी छुटकारा मिल जाता है| 

धरती,वृक्ष और नदी
        से बड़ा कोई दानी नहीं
गलती, गुनाह,पाप, अपराध
         करके जो क्षमा मांग ले
उससे बड़ा कोई ज्ञानी नही
        आमीन
प्रभु आपको आशीष दे
रैव्ह राजेश गिरधर
Share.
Leave A Reply